Bihar Election: तेजस्वी को महंगी पड़ी राहुल गांधी की दोस्ती- दीपेश कुमार

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Bihar Election:

पटना, एजेंसियां। बिहार विधानसभा के नतीजे आ चुके हैं। एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए महागठबंधन को सिरे से उखाड़ कर फेंक दिया है। यह अलग बात है कि एनडीए फिर भी 2010 के जीत के आंकड़े से चंद सीटें पीछे रह गया। फिर भी इतनी प्रचंड जीत की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। एग्जिट पोल के दावे भी पीछे छूट गये। अब एक बार फिर बिहार में एनडीए की सरकार बनने जा रही है और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हैं।

इस जीत के जश्न के बीच कई निगाहें महागठबंधन के सीएम फेस तेजस्वी यादव की तलाश कर रही हैं। कुछ लोग राहुल गांधी की प्रतिक्रिया का भी इंतजार कर रहे हैं। हालांकि चुनाव नतीजों के बाद राहुल गांधी का एक ट्वीट जरूर सामने आया था, जिसमें उन्होंने इस हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ा। इसके बाद तो कांग्रेस नेताओं ने एक के बाद एक चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया। परंतु किसी ने भी बिहार में कांग्रेस के इतने खराब प्रदर्शन पर समीक्षा या विचार की बात नहीं कही।

1952 के बाद बिहार में कांग्रेस का यह सबसे खराब प्रदर्शन है। बिहार में कांग्रेस खुद तो डूबी ही, उसने राजद और तेजस्वी की लुटिया भी डूबो दी। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजद और लेफ्ट को कांग्रेस की दोस्ती महंगी पड़ी। बिहार में तो लोग यह भी कह रहे हैं कि राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव का पॉलिटिकल करियर तबाह कर दिया।

क्योंकि, तेजस्वी यादव की अब वापसी की राह बहुत आसान नहीं होनेवाली है। इस चुनाव ने काफी कुछ साफ कर दिया है। सबसे बड़ा और पॉजिटिव संदेश तो यही है कि इस बार बिहार में लोगों ने जाति और धर्म की सोच से ऊपर उठ कर वोटिंग की है। और बिहार में तो राजद या लालू प्रसाद यादव की राजनीति तो मुख्य रूप से जाति और धर्म यानी एमवाई मुस्लिम और यादव समीकरण पर ही आधारित रही है। दूसरी बात कि लालू यादव अपने स्वास्थ्य के कारण राजनीतिक रूप से बहुत सक्रिय नहीं हैं।

विभिन्न तरह की कानूनी उलझनों ने भी उन्हें जकड़ रखा है। ऐसे में अगले पांच साल तक वह राजनीति में कितना सक्रिय रह पायेंगे या लोगों से कितना कनेक्ट रह पायेंगे, कहना मुश्किल है। दूसरी ओर तेजस्वी यादव अभी राजनीतिक रूप से उतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वह लालू यादव की जगह ले सकें। पांच साल बाद तक पार्टी, संगठन और कार्यकर्ताओं को सत्ता से दूर रहकर भी एक धागे में पिरो कर रखना उनके लिए आसान नहीं होगा। आज भी उनकी मुख्य पहचान लालू यादव के छोटे पुत्र के रूप में ही है। यह अलग बात है कि तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में मेहनत बहुत की। वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत तो कर सकते हैं, लेकिन लालू यादव जैसा करिश्माई व्यक्तित्व कहां लायेंगे।
अब बात करते हैं कि कांग्रेस के साथ का राजद को कैसे नुकसान हुआ।

तेजस्वी यादव को राहुल गांधी की राष्ट्रीय नेता की छवि काफी प्रभावित करती है। दोनों आपस में मित्रवत भी हैं। पर विश्लेषक बताते हैं कि यही मित्रता तेजस्वी यादव को ले डूबी। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि राहुल गांधी ने तेजस्वी का इस्तेमाल कर उनके हाल पर छोड़ दिया। चुनाव की घोषणा से पहले एसआइआर को लेकर राहुल गांधी काफी रेस दिखे। उन्हें लगा है जैसे यह एक बड़ा मुद्दा मिल गया, जिसे पूरे देश में भुनाया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने वोट चोरी जैसे निगेटिव स्टेटमेंट को ही चुनावी हथियार बना लिया। वह शायद भूल गये कि इससे पहले भी वह चौकीदार चोर बोलकर अपनी दुर्गती देख चुके हैं।

वोट चोरी के मुद्दे को उन्होंने राष्ट्र स्तर पर भुनाना चाहा। निरंतर प्रेस कांफ्रेंस कर चुनाव आयोग पर हमला बोला और बम फोड़ने के दावे किये। फिर उन्होंने इस मुद्दे को भंजाने के लिए बिहार चुनाव को हथियार बनाया और तेजस्वी के कंधे पर खेल गये। चुनाव का शेड्यूल आने से पहले वोट चोरी का मुद्दा लेकर बिहार में यात्रा निकाली। इसमें तेजस्वी यादव और उनके समर्थकों ने बढ़चढ़ कर उनका साथ दिया। कांग्रेस और राजद समर्थकों की भीड़ ने उनका काफी उत्साह बढ़ाया। तेजस्वी तो इस समर्थन को देख इतने उत्साहित हुए कि वे मुख्यमंत्री की गद्दी के लिए एक तरह से अड़ ही गये। उधर चुनाव की घोषणा के बाद से ही राहुल गांधी सुस्त पड़ गये। लोगों का तो कहना है कि उन्हें अहसास हो गया था चुनावी नतीजे क्या होंने वाले हैं। अपनी पार्टी को लेकर भी वे मुगालते में नहीं थे।

हालांकि इस सुस्ती क बाच तेजस्वी और कांग्रेस के आमंत्रण पर वह बिहार आये और चुनाव प्रचार भी किया। परंतु यहां जब भी उन्होंने मुंह खोला और अपनी पार्टी तथा तेजस्वी का नुकसान ही किया। पहले तो उनकी सभा के दौरान कांग्रेस समर्थकों ने पीएम मोदी और उनकी मां को गाली दे दी। इस पर न तो राहुल और न ही तेजस्वी ने ही गलती मानी, बल्कि दोनों ही चुप्पी साध गये। दोनों को यह भी याद नहीं रहा कि जब गुजरात में पीएम को गाली दी गई थी, तो चुनाव में क्या हुआ था। फिर बिहार कांग्रेस के एक एआइ वीडियो ने विवाद पैदा किया, जिसमें पीएम मोदी और उनकी मां को दिखाया गया था।

इसके बाद राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा में पीएम मोदी को लेकर कह दिया कि वह वोट के लिए नाचते हैं। फिर एक सभा में बिहार के महापर्व छठ लेकर भी विवादित टिप्पणी कर दी। इससे पहले बिहार प्रदेश कांग्रेस ने राहुल गांधी के फोटो लगे 5 लाख सेनिट्री पैड महिलाओं में मुफ्त बांटने की घोषणा कर अलग विवाद पैदा कर दिया था।

इतना नही नहीं, चुनाव के लिए जब नामांकन शुरू हुए, तो महागठबंधन में शामिल दलों के बीच अपसी समझौता हो ही नहीं सका। सभी ने अपने-अपने प्रत्याशी उतारने शुरू कर दिये। फिर तेजस्वी सीएम फेस के लिए अड़ गये। फिर कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं और लालू यादव के प्रयासों से समझौता हुआ। कई नेताओं से नामांकन वापस कराये गये। बावजूद इसके करीब 11 सीटों पर फ्रेंडली फाइट की स्थिति बनी रह गई।
इधर, जनता को बेवकूफ समझनों वालों को पता ही नहीं चला कि वो सब कुछ देख भी रही है और समझ भी रही है।

प्रधानमंत्री और उनकी मां को गाली तथा छठ महापर्व जैसे मुद्दों को बीजेपी ने हथियार बना लोगों की भावना के तार को छेड़ दिया और महागठबंधन की सारी चाल उल्टी पड़ती चली गई। इधर, कांग्रेस और राहुल गांधी की दोस्ती राजद को इतनी भारी पड़ी कि चेहरा छुपाना मुश्किल हो गया। चर्चाओं के मुताबिक राहुल गांधी तो शायद देश से बाहर हैं पर तेजस्वी अब क्या करें। पिछले दो माह से सोशल मीडिया पर जबरदस्त रूप से सक्रिय रहे राहुल गांधी ने बस एक छोटा सा ट्वीट कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली।

बताते चलें कि राहुल गांधी के नेतृत्व में यह 35वीं हार है। चुनाव प्रचार के दौरान तालाब में नहाने और मछली मारने तथा बच्चों संग मस्ती करने से क्षणिक लोकप्रियता तो जरूर मिलती है, लेकिन चुनाव में जीत नहीं, यह समझना जरूरी है। ऐसे दृश्य टीवी और अखबारों में अच्छे लगते हैं।
अब राहुल गांधी की बात हो रही है, तो कांग्रेस की दूसरी स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी को कैसे भूला जा सकता है।

इस चुनाव में वो थीं तो स्टार प्रचारक पर मेहमान के तौर पर इक्का-दुक्का ही दिखीं। पहले तो भी भाई राहुल गांधी के वोट चोरी के खिलाफ मुहिम शामिल हुईं और बाइक पर यात्रा कर फोटो खिंचवाई। इसके बाद जब चुनाव प्रचार करने आईं, तो सिर्फ पीएम मोदी पर निशाना साधा। पलायन पर बोली, पर इसे लेकर भी उनके पास कोई आंकड़ा नहीं था। मतलब यहां कांग्रेस ने सिर्फ उनका फेस वैल्यू भुनाने की ही कोशिश की, पर इसका कोई लाभ नहीं मिला। राष्ट्र या प्रदेश किसी भी स्तर पर राजनीति करनेवाले लोगों को यह नहीं भुलना चाहिए कि बिहार के लोग बेवकूफ नहीं हैं। यह गौतम बुद्ध, चाणक्य, सम्राट अशोक और डॉ राजेंद्र प्रसाद की भूमि है और यहां लोग राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व माने जाते हैं। जिन्होंने ने भी जनता को बेवकूफ समझने की गलती की, उनका हस्र कुछ ऐसा ही होता रहा है।

नोटः लेखक आइडीटीवी इंद्रधनुष के संपादक हैं…

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