Ram Rahim released: 15वीं बार पैरोल पर बाहर आए राम रहीम, बार-बार रिहाई पर सियासी बवाल

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Ram Rahim released

रोहतक, एजेंसियां। रोहतक की सुनारिया जेल में साध्वियों से यौन शोषण और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर पैरोल पर जेल से बाहर आ गए हैं। यह 15वीं बार है जब उन्हें पैरोल या फरलो मिली है। सोमवार 5 जनवरी को सुबह करीब 11:30 बजे वे सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा मुख्यालय के लिए रवाना हुए। इससे एक दिन पहले ही रोहतक जिला प्रशासन ने 40 दिनों की पैरोल के आदेश जारी किए थे।

राम रहीम की रिहाई पे राजनितिक विवाद

गुरमीत राम रहीम की बार-बार रिहाई को लेकर एक बार फिर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए हैं कि लगभग हर बार उनकी पैरोल का समय चुनाव या डेरा के बड़े धार्मिक आयोजनों से पहले क्यों तय होता है। इस बार भले ही कोई चुनाव न हो, लेकिन डेरा मुख्यालय में प्रस्तावित कार्यक्रमों से पहले उनकी रिहाई ने टाइमिंग पर संदेह बढ़ा दिया है।

राम रहीम 2017 से जेल में बंद

गौरतलब है कि गुरमीत राम रहीम 25 अगस्त 2017 से जेल में बंद हैं, जब सीबीआई अदालत ने उन्हें दो साध्वियों के यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद जनवरी 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। इसके बावजूद वे अब तक 15 बार जेल से बाहर आ चुके हैं, जिनमें अधिकांश अवसर चुनावों या बड़े डेरा आयोजनों से जुड़े रहे हैं।

डेरा सच्चा सौदा और हरियाणा सरकार की ओर से इन रिहाइयों को जेल मैन्युअल के तहत बताया जा रहा है। डेरा के प्रवक्ता और लीगल एडवाइजर जितेंद्र खुराना का कहना है कि गुरमीत राम रहीम को कोई विशेष रियायत नहीं दी गई है और उन्हें वही अधिकार मिले हैं जो नियमों के तहत अन्य सजायाफ्ता कैदियों को मिलते हैं। उनके मुताबिक, अच्छे आचरण के आधार पर हर साल निर्धारित अवधि की पैरोल और फरलो का प्रावधान है।

कांग्रेस और विपक्षी दलों का आरोप

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि राम रहीम को राजनीतिक फायदे के लिए बार-बार राहत दी जा रही है। पंजाब कांग्रेस विधायक परगट सिंह ने कहा कि राम रहीम के मामलों में कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल हैं और हरियाणा व पंजाब की सरकारें इस मुद्दे पर जवाबदेही से बच रही हैं। उनका कहना है कि बार-बार दी जा रही पैरोल ने न्याय व्यवस्था और पीड़ितों के अधिकारों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

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