दावोस के बाद मिल रहे केंद्र और झारखंड के सुर-ताल- आनंद कुमार

Anjali Kumari
6 Min Read

Davos meeting impact India

झारखंड की राजनीति में
बदलाव दिखने लगा है.
और यह बदलाव दावोस
से चलकर बहुत जल्द झारखंड आनेवाला है।
आज हम बात करेंगे—
कि दावोस 2026 के बाद
केंद्र और झारखंड सरकार के रिश्ते कैसे बदलते दिख रहे हैं,
और क्यों इस बदले हुए माहौल में कांग्रेस सबसे ज्यादा असहज
और मिसफिट नजर आ रही है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और स्विजरलैंड का दावोस शहर…
यह कोई साधारण सम्मेलन नहीं होता।
यहां कोई भी मुख्यमंत्री
यू ही नहीं पहुंच जाता।
और जब हेमंत सोरेन एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उसी मंच पर खड़े दिखते हैं, तो इसका मतलब साफ़ है झारखंड और दिल्ली के रिश्ते सुधर रहे हैं।
दिल्ली ने हेमंत सोरेन की राजनीतिक ताकत को जान और मान लिया है। ईडी-सीबीआई सब आजमाये जा चुके हैं।
लेकिन, हेमंत लगातार मजबूत होते जा रहे हैं, तो भाजपा को समझ आ गया है कि जितना हेमंत को छेड़ा जायेगा, उतना ही नुकसान उसे उठाना पड़ेगा।
पिछले लोकसभा चुनाव में तीन सीटें घट गयी।
विधानसभा चुनाव में लगातार सीट घटती जा रही है। लेकिन, इस तकरार का खामियाजा दोनों पक्षों को उठाना पड़ रहा है।
और अंततः देश को भी।
हेमंत का झारखंड 2050 का विजन केंद्र के साथ के बिना संभव नहीं और मोदी का विजन 2047 झारखंड के बिना पूरा नहीं होता। झारखंड में बेशुमार खनिज है। कोयला है।
और कोयला जरूरत है… इंडस्ट्री के लिए, बिजली के लिए
क्या आपने सोचा कि
दावोस में झारखंड की मौजूदगी
पहली बार इतनी सशक्त क्यों थी, क्या यही अपने आप में
राजनीतिक संकेत नहीं था।
अब सवाल उठता है—
क्या हेमंत सोरेन और
नरेंद्र मोदी एक साथ आ रहे हैं?
तो जवाब है— नहीं। लेकिन, क्या उनके सुर और ताल मिल रहे हैं? तो जवाब है हां, ऐसा दिख रहा है। यह सुर मिलना
कोई वैचारिक मेल नहीं है,
यह व्यावहारिक तालमेल है।
मोदी सरकार को चाहिए
एक शांत, स्थिर और निवेश-अनुकूल राज्य। और हेमंत सोरेन को चाहिए अपनी सरकार चलाने के लिए केंद्रीय सहायता और सहयोग।
यहीं दोनों के रास्ते आकर एक बिंदु पर मिलते हैं। दोस्तों, दिल्ली अब यह समझ चुकी है कि— हेमंत सोरेन कोई कमजोर मुख्यमंत्री नहीं हैं। उनके पास—
आदिवासी समाज का ठोस समर्थन है, अल्पसंख्यक पूरी तरह लामबंद हैं और प्रशासनिक नियंत्रण भी उनके हाथ में है।
यही वजह है कि जहां झारखंड में कुछ लोग अब भी उनका कोट देख रहे हैं, उसकी कीमत बता रहे हैं सवाल कर रहे हैं
वहीं दिल्ली अब उनका वोट देख रही है।
और यह वोट चुनावी नहीं,
स्थिरता का वोट है। अब तस्वीर के दूसरे पहलू का रुख करते हैं।
जब मुख्यमंत्री दावोस में निवेश ला रहे हैं, राज्य की छवि सुधार रहे हैं… तभी कांग्रेस के कुछ नेता क्या कर रहे हैं?
कोई उद्योगों के खिलाफ
आंदोलन के नाम पर
निवेशकों को डरा रहा है।
तो कहीं मंत्री-विधायकों में खींचतान चल रही है। कहीं कांग्रेसी बोर्ड-निगम में जगह के लिए दवाब बना रहे हैं। साफ़ शब्दों में कहें तो मुख्यमंत्री विदेशों में रास्ते खोल रहे हैं,
और गठबंधन के ही कुछ नेता
उन रास्तों पर कांटे बिछा रहे हैं।
यही बात अब हेमंत सोरेन को भी खटकने लगी है। कांग्रेस आज सिर्फ झारखंड में नहीं,
अपने अंदर भी गंभीर असमंजस से जूझ रही है। नेतृत्व को लेकर भ्रम, खेमेबाजी भूमिकाओं को लेकर खींचतान, और बयानों पर कोई नियंत्रण नहीं। इसके उलट
हेमंत सोरेन अब बोलने से ज्यादा ऑब्ज़र्व करते दिख रहे हैं। और उनका एक्शन
लेट, लेकिन बहुत हार्ड होता है।
दावोस के बाद सारंडा में सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस नक्सल विरोधी बड़ी कार्रवाई करती है। एक करोड़ के ईनामी अनल दा और उसके दस्ते के 15 सदस्य मारे जाते हैं। यह संयोग नहीं है। यह केंद्र-राज्य समन्वय का उदाहरण है।
निवेश, सुरक्षा, और राजनीतिक तालमेल तीनों एक साथ चलते हैं।
केंद्र सरकार जानती है कि
अगर झारखंड में शांति चाहिए, वहां से कोयला और खनिजों की
सुगम उपलब्धता चाहिए,
तो राज्य सरकार को
स्थिर रखना होगा। वहां सुरक्षा देनी होगी।
यही वजह है कि फिलहाल
कोई टकराव नहीं लिया जा रहा,
कोई दबाव भी नहीं दिखता।
यहां एक बात बहुत साफ़ समझ लीजिए—
❌ यह झामुमो–भाजपा गठबंधन का संकेत नहीं है
❌ यह सरकार बदलने की स्क्रिप्ट भी नहीं है
✔️ यह म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग है
✔️ यह वर्किंग रिलेशनशिप है
हेमंत सोरेन अपनी सरकार चलाएंगे, और केंद्र सरकार
अनावश्यक अड़चन नहीं डालेगी।
लेकिन, कांग्रेस अड़चन डालेगी तो हेमंत कोई बड़ा एक्शन ले सकते हैं।
बस इतना ही मामला है।
दावोस 2026 के बाद
झारखंड की राजनीति एक नए मोड़ पर है। यह मोड़
न गठबंधन का है, न टकराव का, बल्कि तालमेल और स्थिरता का है।
हेमंत–मोदी के मिलते सुर
और कांग्रेस से बढ़ती दूरी
अब झारखंड की सियासत की
नई धुरी बनते दिख रहे हैं।
अगर यही संतुलन बना रहा,
तो यह बेहतरी झारखंड के लिए
विकास का रास्ता खोल सकती है।
नज़र बनाए रखिए…
क्योंकि कहानी अभी बाकी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Share This Article