Pradeep Mishra:
नई दिल्ली, एजेंसियां। कथावाचक प्रदीप मिश्रा ने संत की परिभाषा और आजकल चर्चित विवादों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि संत केवल वे लोग होते हैं जो परमात्मा के निकट होते हैं और जिनके भीतर वास्तविक शांति और संतोष होता है। इसके आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि धीरेंद्र शास्त्री और देवकीनंदन-अनिरुद्धाचार्य को संत नहीं कहा जा सकता, बल्कि वे कथावाचक हैं।
प्रदीप मिश्रा ने बताया
प्रदीप मिश्रा ने बताया कि अक्सर लोग दूसरों को शांति का संदेश देते हैं लेकिन खुद में यह गुण नहीं रखते। ऐसे लोग संत नहीं माने जा सकते। उन्होंने कहा कि मंच से कभी भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, जिससे लोगों में गुस्सा या विवाद पैदा हो।
विकलांग संन्यासी पर टिप्पणी
उन्होंने कहा कि विकलांग व्यक्ति भी सन्यासी हो सकता है, जैसे सूरदास जी थे। असली साधक वही है जो भाव से भगवान को भजता हो, चाहे वह किसी भी शारीरिक स्थिति में हो।
असली संत कौन?
प्रदीप मिश्रा ने कहा कि संतों के बीच झगड़े देखने को मिलते हैं, लेकिन असली संत वह है जिसके भीतर संतोष और शांति हो। संगति और बाहरी प्रतीक कुछ भी नहीं सिखाते।
संस्कृत ज्ञान पर टिप्पणी
उन्होंने यह भी कहा कि प्रेमानंद महाराज को संस्कृत का ज्ञान न होना उनके भक्ति और भाव को कम नहीं करता। जैसे मीरा बाई की रचनाएं आज भी लोकमन में गूंजती हैं, वैसे ही भाव और प्रेम की भाषा सर्वोपरि है।
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