NATO without the US:
नई दिल्ली, एजेंसियां। नाटो (NATO) यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन की चर्चा अक्सर रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में होती है। 1949 में स्थापित इस संगठन का उद्देश्य सोवियत संघ के प्रभाव को सीमित करना और उसके सैन्य विस्तार का मुकाबला करना था। समय के साथ यह संगठन दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गया है। आज नाटो के 31 सदस्य देश हैं, जिनमें अमेरिका इसकी रीढ़ माना जाता है।अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन को नाटो सदस्यता देने से मना किया और कई बार संकेत दिए कि अमेरिका संगठन से बाहर भी जा सकता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अमेरिका के बाहर होने पर नाटो कितना कमजोर हो जाएगा?
नाटो में अमेरिकी शेयर कितना?
नाटो की आर्थिक और सैन्य क्षमताओं में अमेरिका की भूमिका बेहद अहम है। एक रिपोर्ट के अनुसार, नाटो के 3.5 अरब डॉलर के वार्षिक बजट का 15.8% हिस्सा अकेले अमेरिका देता है। लेकिन यह केवल आर्थिक योगदान नहीं है—संगठन की कुल सैन्य क्षमताओं का लगभग 70% भार भी अमेरिका ही उठाता है।
अमेरिका न केवल सबसे बड़ा फंडर है, बल्कि पूरे यूरोप में 80,000 से 100,000 अमेरिकी सैनिक लगातार तैनात रहते हैं, जो नाटो की सैन्य तैयारी को मजबूत करते हैं।
अगर अमेरिका बाहर हुआ तो क्या होगा?
अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो संगठन की कुल सैन्य क्षमता 50% से अधिक घट जाएगी। यूरोपीय देशों को अमेरिका के बराबर सैन्य स्तर पर पहुंचने में 5–10 साल और भारी खर्च लगेगा।इसके अलावा, अमेरिका के हटते ही नाटो का सामरिक संतुलन बिगड़ जाएगा क्योंकि संगठन की प्रमुख तकनीक, इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स और एयर पावर में अमेरिका की सबसे बड़ी भूमिका है। रूस जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के सामने नाटो की सामूहिक सुरक्षा संरचना कमजोर पड़ जाएगी।
सबसे बड़ा खतरा:
रूस के पास 5580 परमाणु हथियार हैं, जबकि नाटो में अमेरिका के अलावा यूके और फ्रांस के पास मिलाकर लगभग 500 हथियार ही हैं।
अगर अमेरिका अलग हो जाता है, तो नाटो की परमाणु क्षमता रूस के मुकाबले बेहद कम रह जाएगी, जिससे यूरोप की सुरक्षा संरचना पर बड़ा खतरा मंडराएगा।

















