Iran political unrest: ईरान में खामेनेई सरकार के खिलाफ जनविद्रोह, क्या इस कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा ?

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Iran political unrest

तेहरान, एजेंसियां। ईरान में दिसंबर 2025 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब देश के इतिहास के सबसे बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुके हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह पहला मौका है जब 100 से ज्यादा शहरों में एक साथ सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों की अगुवाई अब युवा और महिलाएं कर रही हैं और सीधे तौर पर सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के शासन को चुनौती दी जा रही है। सुरक्षा बलों की सख्ती, गिरफ्तारियां और इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद आंदोलन थमता नजर नहीं आ रहा।

प्रदर्शन की वजह: महंगाई और बेरोजगारी

ईरान में विरोध की शुरुआत आर्थिक संकट से हुई। ईरानी मुद्रा रियाल की ऐतिहासिक गिरावट, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और जरूरी वस्तुओं की कीमतों ने आम लोगों का जीवन मुश्किल बना दिया है। तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुआ आक्रोश जल्द ही राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। हालात इतने गंभीर हैं कि हजारों लोगों की मौत और गिरफ्तारी की खबरें सामने आ रही हैं।

भारत के लिए ईरान क्यों अहम

ईरान भारत का अहम रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। भारत ने चाबहार बंदरगाह में करीब 500 मिलियन डॉलर का निवेश किया है, जिससे भारत को पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच मिलती है। इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत-रूस-यूरोप व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ईरान तेल आपूर्ति और सूखे मेवों के व्यापार में भी भारत का बड़ा साझेदार रहा है।

भारत पर संभावित असर

अगर ईरान में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रही तो भारत को कई मोर्चों पर नुकसान हो सकता है। तेल की वैश्विक कीमतें बढ़ने से भारत में महंगाई बढ़ सकती है। चाबहार परियोजना और रेल लिंक में देरी संभव है। अमेरिकी प्रतिबंध फिर सख्त हो सकते हैं और चीन को क्षेत्रीय बढ़त मिल सकती है। साथ ही ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी चिंता का विषय है।

भारत सरकार की रणनीति

भारत सरकार हालात पर नजर बनाए हुए है और ‘वेट एंड वॉच’ नीति अपना रही है। विदेश मंत्रालय ने भारतीयों को सतर्क रहने की सलाह दी है। कुल मिलाकर, ईरान का यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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