Government interference universities:
झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपति यानी वीसी की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से वापस लेने वाली है। इससे संबंधित विधेयक राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025 को विधानसभा ने पिछले 26 अगस्त को मंजूरी दे दी। इस विधेयक का मकसद है चिकित्सा और कृषि विश्वविद्यालयों को छोड़कर बाकी सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक समान और व्यापक कानून बनाना। अब इसे राज्यपाल संतोष गंगवार के पास अनुमोदन के लिए भेजा जायेगा, जिन्हें यह तय करना होगा कि वे अपने ही अधिकारों में कटौती करनेवाले विधेयक को खुशी-खुशी तत्काल मंजूरी देते हैं या नहीं।
विधानसभा से पारित इस विधेयक में प्रावधान है कि प्रो वीसी, रजिस्ट्रार, एग्जामिनेशन कंट्रोलर और वित्तीय सलाहकार सहित अन्य पदों पर नियुक्ति का अधिकार अब राज्यपाल के पास नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री के पास होगा। विधेयक के मुताबिक विश्वविद्यालयों, उनके विभाग और उनके तहत आनेवाले कॉलेजों में शिक्षकों एवं गैर-शैक्षणिक पदों पर बहाली के साथ-साथ प्रमोशन का फैसला भी राज्य सरकार ही करेगी। यह राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के लिए सिंगल अंब्रेला एक्ट का काम करेगा। इसी के तहत सभी विश्वविद्यालय संचालित होंगे। विश्वविद्यालय सेवा आयोग गठन का प्रवधान विधेयक में है। इसके तहत शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की भर्ती और पदोन्नति के लिए विश्वविद्यालय सेवा आयोग का गठन किया जाएगा, जो झारखंड पात्रता परीक्षा (JET) भी आयोजित करेगा। किसी तरह के वाद-विवाद की स्थिति से निपटने के लिए विभाग में एक ट्रिब्यूनल का गठन किया जायेगा।
इसके फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकेगी। सीनेट की अध्यक्षता प्रति कुलाधिपति या उच्च एवं तकनीकी विभाग के मंत्री करेंगे। जबकि सिंडिकेट की अध्यक्षता कुलपति करेंगे। इसके अलावा सभी विश्वविद्यालयों में शिकायत निवारण तंत्र बनेगा। इसके लिए विश्वविद्यालय स्तर पर रिटायर्ड जिला जज या फिर दस साल से अधिक अनुभव वाले वकील की अध्यक्षता में कर्मचारी शिकायत समिति बनेगी। वहीं राज्य स्तर पर हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कर्मचारी शिकायत न्यायाधिकरण की स्थापना की जाएगी। सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि इससे राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में एक समान नीतियां व संरचना लागू की जा सकेगी।
हालांकि झारखंड ऐसा पहला राज्य नहीं है, जहां विश्वविद्यालयों से संबंधित राज्यपाल की शक्तियों को सरकार में निहित किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और हिमाचल प्रदेश में ऐसी कोशिश हो चुकी है। साल 2019 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने राज्यपाल से कुलपति की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया और मुख्यमंत्री को यह अधिकार सौंपने के लिए विधेयक पेश किया। हालांकि, यह विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबित है। 2021 में महाराष्ट्र विधानसभा ने एक विधेयक पारित किया, जिसमें राज्य सरकार को कुलपति की नियुक्ति के लिए दो नामों का पैनल राज्यपाल को भेजने का अधिकार दिया गया। राज्यपाल को इन दो नामों में से एक का चयन करना अनिवार्य किया गया।
साल 2022 में, तमिलनाडु विधानसभा ने दो विधेयकों को पारित किया जिसमें राज्यपाल के बजाय राज्य सरकार को कुलपति की नियुक्ति का अधिकार देने का प्रस्ताव था। हालांकि, मई 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय ने इन संशोधनों पर रोक लगा दी। इलके अलावा हाल ही में, केरल उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया, जिससे राज्य सरकार को कुलपति की नियुक्ति में अधिक अधिकार मिला। इससे राज्यपाल की भूमिका में कमी आई है। साल 2023 में, हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने एक विधेयक पारित किया, जिसमें प्रावधान है कि राज्यपाल को राज्य सरकार की सलाह पर कुलपति की नियुक्ति करनी होगी। यह विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा गया है।
लेकिन, झारखंड में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा इसे राज्यपाल की शक्तियां छीनने के कदम के रूप में देख रही है। विधानसभा में भाजपा के सतेचक और हटिया विधायक नवीन जायसवाल ने आरोप लगाया कि यह विधेयक पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है और इसका असली मकसद राज्यपाल की शक्तियों को कम करना है। उन्होंने कहा, “यह राज्यपाल की शक्तियों को छीनने का प्रयास है। इसे प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए।
हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब झारखंड में राज्यपाल की शक्तियों में कटौती की कोशिश की गयी है। इससे पहले ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी (टीएसी) में सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल के हाथों में था, लेकिन हेमंत सोरेन सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में यह व्यवस्था समाप्त कर इसका अधिकार भी मुख्यमंत्री को दे दिया। हालांकि तत्कालीन राज्यपाल रमेश बैस ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया था।
सरकार विश्वविद्यालयों का नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथ में क्यों लेना चाहती है? इसपर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के मंत्री सुदिव्य सोनू कहते हैं, “विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक स्तर पर जो लोग हैं, उन्हें राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह बनाया जा रहा है। पहले जवाबदेही कहीं और थी। मंत्री का तर्क है कि निर्वाचित सरकार जनकांक्षाओं को बेहतर समझती है, इसलिए गुणात्मक सुधार की संभावना अधिक है। और इससे शिक्षकों की नियुक्ति-पदोन्नति के लंबित मामलों से भी छुटकारा मिलेगा। हम घंटी आधारित नियुक्ति को खत्म करना चाहते हैं। बैक लॉग खत्म हो। नियमित नियुक्ति हो, इस दिशा में काम होगा।
इस बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा ने तो ये भी मांग कर दी है कि कुलाधिपति भी राज्य के मुख्यमंत्री को ही होना चाहिए, न कि केंद्र से भेजे गये राज्यपाल को। पार्टी प्रवक्ता और रांची यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष तनुज खत्री का बयान आया कि विश्वविद्यालयों में सैलरी और प्रमोशन से लेकर बिल्डिंग के निर्माण तक का खर्चा राज्य सरकार उठाती है, ऐसे में नियंत्रण भी राज्य सरकार का ही होना चाहिए। इससे छात्रसंघ का चुनाव भी समय पर होने की संभावना बढ़ जाएगी। रांची यूनिवर्सिटी सहित राज्य भर के कई कॉलेजों में साल 2019 के बाद से छात्रसंघ के चुनाव ही नहीं हुए हैं। जबकि लिंगदोह कमेटी की सिफारिश के मुताबिक छात्रसंघ का चुनाव हर साल होना चाहिए। हालांकि चुनाव कराने का निर्णय वीसी के क्षेत्राधिकार में आता है।
तो इस विधेयक से क्या बदलेगा, यह बड़ा सवाल है, तो जवाब है कि फिलहाल राज्यपाल के पास सिर्फ कुलपति, प्रतिकुलपति और फाइनेंस एडवाइजर की नियुक्ति का अधिकार था। इसके अलावा फाइनेंस अफसर, परीक्षा नियंत्रक और रजिस्ट्रार के पद पर राज्य सरकार अगर स्थायी नियुक्ति नहीं कर पाती है, तो इन पदों पर अस्थाय़ी नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल के पास है। इसके अलावा गजेटेड रैंक की सभी नियुक्ति का अधिकार झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन और नॉन गजेटेड स्टाफ की नियुक्ति झारखंड स्टाफ सलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) यानी राज्य सरकार के पास ही है। आपको बता दें झारखंड में कुल 11 विश्वविद्यालय हैं और 82 सरकारी कॉलेज हैं। स्थिति यह है कि पूरे राज्य में लगभग 3000 शिक्षक और 1800 कर्मचारी के पद खाली पड़े हैं। तो सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार अपने हिस्से की जिम्मेदारी यानी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सभी खाली पदों को भर पा रही थी? अगर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में टीचर और कर्मचारी ही नहीं होंगे, तो वीसी, प्रो वीसी और फानेंस एडवाइजर की नियुक्ति सरकार के हाथ में आ भी जाये, तो शिक्षा की स्थिति में इससे क्या सुधार आयेगा।
अगर सत्ता में बैठे नेताओं और जेएमएम से जुड़े लोगों की दावों पर गौर करें, तो यही समझ में आता है कि मामला शिक्षा का नहीं बल्कि विचारधाराओं के टकराव का है। हेमंत सरकार और उनकी पार्टी से जुड़े तमाम लोगों का दावा है कि पिछले कुछ सालों से बीजेपी के सदस्य या समर्थित लोग विश्वविद्यालयों के अहम विभागों को संभाल रहे हैं। यही लोग पाठ्यक्रम से लेकर तमाम नियुक्तियों पर भी फैसला करते हैं और विश्वविद्यालयों को हिंदूवादी राजनीति यानी भगवाकरण का केंद्र बना रहे हैं। ताजा विधेयक के पीछे एक बड़ी वजह इसी को बताया जाता है। झारखंड यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ जगदीश लोहरा का एक कोट मैंने कहीं पढ़ा। उनका मानना है कि एक हद तक यह भगवाकरण हटाने की कवायद ही दिख रही है और यह सही भी है। छात्र राजनीति पहले भी होती थी, होनी भी चाहिए, लेकिन बीते दस साल में दिल्ली के जेएनयू से लेकर बहुतेरे विश्वविद्यालयों का भगवाकरण हो गया है, इससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता। सिलेबस थोपने के नाम कैंपसों को अलग राजनीतिक अखाड़ा बना दिया गया है। जगदीश कहते हैं कि मेरा साफ मानना है कि कॉलेजों में सभी तरह की विचारधारा आने का स्वागत होना चाहिए। न कि किसी एक का।
हालांकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बिहार-झारखंड के क्षेत्रीय संगठन मंत्री याज्ञ्यवल्क्य शुक्ला इस फैसले को संवैधानिक व्यवस्था में दखल मानते हैं। वे कहते हैं, ‘’शिक्षा के क्षेत्र में पावर की लड़ाई नहीं होनी चाहिए। विश्वद्यालयों में शिक्षकों की बहाली तो राज्य सरकार के पास ही है। वह काम तो अब तक हेमंत सरकार ने किया नहीं, अब वीसी बहाल करने चले हैं। उनका आरोप है कि सोरेन मूल मुद्दों जैसे डोमिसाइल नीति, बेरोजगारी भत्ता नहीं दे पाए इसलिए यह छात्रों को नए मुद्दे में उलझाने की पहल भर है। आईसा की स्टेट प्रेसिडेंट विभा पुष्पा कहती हैं कि हम लोग लंबे समय से इसकी मांग भी कर रहे थे। यूनिवर्सिटी में ऐसे वीसी की नियुक्ति हो रही थी जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यूनिवर्सिटी का भगवाकरण हो रहा था। स्थाई नियुक्ति नहीं हो पा रही थी, अस्थाई वीसी घोटाला करने में व्यस्त थे।
विनोबा भावे विश्वविद्यालय में तो अधिकारियों ने 48 लाख रुपए का काजू, किशमिश खा लिया। उसकी जांच भी पूरी नहीं हुई। एनएसयूआई के स्टेट प्रेसिडेंट विनय उरांव कहते हैं कि संघ विचारधारा वाले वीसी या प्रिंसिपल हमें अपने कैंपस में घुसने तक नहीं देते, जबकि एबीवीपी को हर तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति मिल जाती है। वे कहते हैं कि अगर विश्वविद्यालयों में किसी तरह की गड़बड़ी होती है, तो हम सीधे राज्य सरकार से पूछ सकते हैं। छात्रहित में राज्य सरकार से लड़ना आसान है, जबकि केंद्र से लड़ना मुश्किल।
झारखंड में कुछ लोग इस कदम को विश्वविद्यालयों के बढ़ते राजनीतिकरण की तरह भी देख रहे हैं। रांची यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी डॉ सत्यनारायण मुंडा का कहना है कि कॉलेज कैंपस को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो। मुंडा कहते हैं कि मुझे याद नहीं कि पिछले कुछ सालों में झारखंड की किसी भी यूनिवर्सिटी का कोई रिसर्च चर्चा में रही हो।
मगर सारे वाद विवादों के बीच ये विधेयक विधानसभा से पास हो चुका है और अब अनुमोदन के लिए राज्यपाल के पास जाएगा। लेकिन, सवाल वही है जो मैंने शुरुआत में पूछा था कि क्या राज्यपाल इस पर खुशी-खुशी तत्काल स्वीकृति दे देंगे?
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान के पूर्व संपादक हैं…)
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