Rath Yatra:
रांची। पूरे देश में आज 27 जून को भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की जा रही है। हर ओर भक्ति का माहौल है। कई जगहों पर पथयात्रा निकल रही है। पूरा देश जय जगन्नाथ के जयकारों से गुंजायमान है।
Rath Yatra: विश्व प्रसिद्ध है भगवान जगन्नाथ की रथयात्राः
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है। आज से शुरू हुआ यह पावन पर्व अगले 10 दिनों तक चलेगा। भगवान जगन्नाथ को उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र) और बहन सुभद्रा के साथ पूजा जाता है। यह रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और अध्यात्म का जीवंत प्रतीक है।
Rath Yatra: रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। इसी यात्रा को “जगन्नाथ रथ यात्रा” कहा जाता है। इसके लिए तीन भव्य और विशाल रथ बनाए जाते हैं, जो न केवल दर्शनीय होते हैं बल्कि प्रत्येक का रंग और नाम अलग होता है। इन रथों को देखने मात्र से ही भक्तों के मन में उल्लास भर जाता है और उनकी श्रद्धा और गहरी हो जाती है। रांची समेत कई जगहों पर एक ही रथ पर तीनों भगवान को सवार कराकर मौसी के घर ले जाया जाता है।
Rath Yatra: रथों की कैसे की जाती है पहचान?
तीनों रथों की पहचान उनके रंगों और आकार से की जाती है। बलराम जी का रथ “तालध्वज” कहलाता है, जो लाल और हरे रंग का होता है और उनके पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। देवी सुभद्रा का रथ “दर्पदलन” या “पद्म रथ” कहलाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, यह उनकी शांति और सौम्यता का प्रतीक है। वहीं भगवान जगन्नाथ का रथ “नंदीघोष” या “गरुड़ध्वज” कहलाता है, जो लाल और पीले रंग में बना होता है और भगवान की विशालता, करुणा और लोककल्याण की भावना को दर्शाता है।
Rath Yatra: भगवान भक्तों के बीच आते हैः
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि वह पावन क्षण है जब भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। जैसे-जैसे रथ आगे बढ़ते हैं, भक्तों की आस्था भी साथ-साथ चलती है और उनके मन में यह विश्वास और गहरा होता है कि भगवान उनसे दूर नहीं, बल्कि सदा उनके साथ हैं।
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