Blood Donation:
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ब्लड टेस्टिंग की आधुनिकतम तकनीकें भी संक्रमण (जैसे HIV, हेपेटाइटिस आदि) को 100% सटीकता से नहीं पकड़ सकतीं। इसलिए, हाई-रिस्क समूहों को रक्तदान से बाहर रखना एक वैज्ञानिक और एहतियाती फैसला है।
2017 के डोनर गाइडलाइंस पर सरकार की दलील
केंद्र ने कहा कि Blood Donor Selection & Referral Guidelines – 2017 में ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों को उच्च जोखिम वाले समूहों के तौर पर चिन्हित किया गया है। यह गाइडलाइंस वैज्ञानिक रिसर्च, महामारी विज्ञान और पब्लिक हेल्थ सिद्धांतों पर आधारित है।
विंडो पीरियड सबसे बड़ा खतरा
सरकार के मुताबिक, कुछ संक्रमणों के शुरुआती स्टेज में टेस्ट उन्हें नहीं पकड़ पाते – इसे “विंडो पीरियड” कहते हैं। ऐसे में हाई-रिस्क व्यक्तियों से रक्तदान लेना ब्लड सप्लाई की सेफ्टी के लिए खतरा हो सकता है।
दूसरे देशों में क्या स्थिति है?
कुछ पश्चिमी देशों ने ब्लड डोनेशन पर लगे प्रतिबंधों को ढीला किया है, लेकिन भारत के पड़ोसी देश – जैसे श्रीलंका, मलेशिया, चीन, थाईलैंड आदि – अब भी उच्च जोखिम वाले समूहों पर रोक बरकरार रखे हुए हैं। भारत भी अपनी स्वास्थ्य परिस्थितियों और इन्फ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए ऐसा कर रहा है।
याचिका में भेदभाव का आरोप
थंगजम संता सिंह नामक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इन प्रतिबंधों को भेदभावपूर्ण बताया है। याचिका में कहा गया कि ट्रांसजेंडर और समलैंगिक पुरुषों को रक्तदान से रोकना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
केंद्र का दो-टूक जवाब
केंद्र सरकार ने कहा कि जनस्वास्थ्य और रक्त की गुणवत्ता को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी प्राथमिक है। ऐसे में मौजूदा दिशानिर्देश हटाए नहीं जा सकते।
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