Aravalli Hills
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक अरावली एक बार फिर सियासी और पर्यावरणीय बहस के केंद्र में आ गई है। अरावली की परिभाषा और उससे जुड़े चर्चित “100 मीटर फॉर्मूले” को लेकर चल रहे विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है। इस फैसले के बाद खनन बनाम संरक्षण की बहस और तेज हो गई है।
वैज्ञानिक परिभाषा को लेकर विवाद
दरअसल, विवाद उस नई वैज्ञानिक परिभाषा को लेकर है, जिसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति ने तैयार किया और जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को स्वीकार कर लिया। इस परिभाषा के मुताबिक, स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली जमीन को अरावली की पहाड़ी माना जाएगा। यदि 500 मीटर के दायरे में ऐसी दो या अधिक पहाड़ियां होंगी, तो उन्हें एक ही पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा। इन पहाड़ियों और उनसे जुड़े सभी लैंडफॉर्म में खनन पर रोक रहेगी, चाहे उनकी ऊंचाई या ढलान कुछ भी हो।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उठाये सवाल
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस 100 मीटर फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इससे अरावली का बड़ा हिस्सा खनन के लिए खोल दिया जाएगा और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे फॉर्मूले को खारिज कर चुका है। हालांकि केंद्र सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का दावा
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का दावा है कि नई परिभाषा के तहत अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षित दायरे में आ जाएगा। सरकार के मुताबिक, कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर के अरावली क्षेत्र में से सिर्फ 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही खनन की अनुमति है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों को अपने आप खनन के लिए नहीं खोला गया है, बल्कि पूरे पहाड़ी सिस्टम और उससे जुड़े इलाकों पर पाबंदी लागू रहेगी।
व्यवस्था का आधार राजस्थान मॉडल
इस नई व्यवस्था का आधार राजस्थान मॉडल को बनाया गया है, जिसे अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ हरियाणा, गुजरात और दिल्ली ने भी अपनाने पर सहमति दी है। इसमें पहाड़ियों की अनिवार्य मैपिंग, कोर और अछूते क्षेत्रों की पहचान, ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी तथा अवैध खनन रोकने के लिए जिला स्तर पर टास्क फोर्स जैसे प्रावधान शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया है कि पूरे अरावली क्षेत्र के लिए सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार होने तक नई खनन लीज पर रोक रहेगी। कोर और अछूते क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा और मौजूदा खानों को भी सख्त पर्यावरणीय नियमों का पालन करना होगा।
दिल्ली से गुजरात तक फैली अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने, भूजल रिचार्ज और जैव विविधता के लिए बेहद अहम मानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद अब असली चुनौती केंद्र और राज्य सरकारों के सामने है कि वे इन नियमों को जमीन पर कितनी सख्ती से लागू कर पाते हैं, ताकि अरावली का संरक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए।








