Durga Puja 2025:
कोलकाता, एजेंसियां। बंगाल और पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा का सबसे अहम दिन षष्ठी तिथि होती है। इस दिन से ही सामूहिक दुर्गोत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। परंपरागत रूप से इस दिन षष्ठी माता की पूजा की जाती है और माताएं अपनी संतान की रक्षा एवं उनके उत्तम स्वास्थ्य के लिए आशीर्वाद मांगती हैं।
षष्ठी पूजन और बोधन
षष्ठी तिथि को मां दुर्गा का आह्वान (बोधन) किया जाता है। इसे अकाल बोधन भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भगवान राम ने रावण वध से पहले असमय माता का आह्वान किया था। इसी परंपरा का पालन करते हुए देवी को षष्ठी के दिन जगाया जाता है और पूजा पंडालों में स्थापित किया जाता है।
कोला बहू और नबा पत्रिका पूजन
षष्ठी की पूजा में सबसे अहम है कोला बहू (केले का पेड़) और नबा पत्रिका की स्थापना। नबा पत्रिका में नौ तरह के पत्ते शामिल होते हैं, जिन्हें मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों का प्रतीक माना जाता है। इन पत्तों को केले के पेड़ के साथ बांधा जाता है, फिर गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कराकर उन्हें पारंपरिक बंगाली साड़ी और सिंदूर से सजाया जाता है। इसे पंडाल में लाकर मां के एक रूप के रूप में पूजा की जाती है।
प्रकृति पूजन का प्रतीक
कोला बहू और नबा पत्रिका को प्रकृति पूजन का प्रतीक माना जाता है। शरद ऋतु में नई फसल और फूल आने का समय होता है। यह पूजा प्रकृति के प्रति आभार और अच्छी फसल की कामना का प्रतीक है। इसी वजह से बंगाल और पूर्वी भारत में इसे सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। दुर्गा पूजा की शुरुआत षष्ठी से होती है, जब मां दुर्गा को जगाकर पूजा पंडालों में स्थापित किया जाता है। कोला बहू और नबा पत्रिका पूजन इस दिन की सबसे खास परंपरा है, जो न केवल देवी शक्ति का आह्वान करती है बल्कि प्रकृति और जीवन के संतुलन का संदेश भी देती है।
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