Screen time mental health:
नई दिल्ली, एजेंसियां। एक ताज़ा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मोबाइल एडिक्शन लोगों को दिमागी रूप से बीमार बना रहा है। सुबह उठते ही फोन चलाना और रात तक स्क्रीन से चिपके रहना आज की पीढ़ी की बड़ी समस्या बन चुकी है। हर दूसरा व्यक्ति बिना मोबाइल के बेचैन हो रहा है, जबकि इसकी लत मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 73% लोग रोज़ाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, जिससे स्क्रीन फटीग, फोकस लॉस और फैंटम वाइब्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
महाराष्ट्र के सांगली जिले का मोहीत्यांचे वडगांव गांव डिजिटल डिटॉक्स की अनोखी मिसाल बना है। यहां हर दिन शाम 7 बजे सायरन बजते ही पूरा गांव एक घंटे तक मोबाइल और लैपटॉप छोड़कर ‘ऑफलाइन हीलिंग’ की ओर लौट आता है। लोग परिवार के साथ समय बिताते हैं, बच्चे होमवर्क करते हैं और सब मिलकर मन को शांत करने का प्रयास करते हैं। कोरोना के बाद बच्चों पर इसका असर और बढ़ गया है। अयोध्या मेडिकल कॉलेज में एक किशोर नोमोफोबिया से ग्रस्त पाया गया मतलब मोबाइल से दूर रहने का डर।
यही नहीं, एल्गोरिदम ट्रैप के कारण लोग लगातार उसी तरह के कंटेंट में फंसते जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते, जिससे ‘स्क्रॉल-गिल्ट’ बढ़ता है। अध्ययन बताता है कि 14 से 24 साल के युवाओं में पिछले एक साल में फोन की लत से जुड़े मामलों में 15-20% की बढ़ोतरी हुई है। एमएनसी कर्मचारियों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जो 8 घंटे लैपटॉप और 5-6 घंटे मोबाइल पर बिता रहे हैं। मोबाइल एडिक्शन से 60% लोगों की नींद प्रभावित हो रही है।
स्मार्टफोन का आंखों पर बुरा असर:
लगातार स्क्रीन देखने से स्मार्टफोन विज़न सिंड्रोम बढ़ रहा है। इससे नजर कमजोर, आंखों में सूखापन, सूजन, लालपन और तेज रोशनी में दिक्कत जैसी परेशानियां सामने आ रही हैं।
बच्चों में फोन का मिसयूज बढ़ा:
रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चे फोन का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन 90% माता-पिता इस पर ध्यान नहीं देते। यह लापरवाही बच्चों की फोन लत को और गहरा कर रही है।
डिजिटल बाउंड्री बनाना जरूरी:
विशेषज्ञों ने ‘नो-फोन ज़ोन’, खाने के समय स्क्रीन बंद और परिवार के वास्तविक संवाद जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी है, ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर फोन के नकारात्मक असर को कम किया जा सके।







