Madras High Court
चेन्नई, एजेंसियां। लिव-इन रिलेशनशिप आज की नई पीढ़ी में आम होती जा रही है। प्यार और भरोसे के आधार पर शुरू होने वाले ऐसे रिश्तों में कई बार हालात उस मोड़ पर पहुंच जाते हैं, जहां सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ता है। अक्सर देखने में आता है कि लंबे समय तक साथ रहने के बाद पुरुष शादी से पीछे हट जाता है, महिला पुरुष पर शारीरिक शोषण का आरोप लगती है।
इसी लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में महिलाओं की कानूनी सुरक्षा को लेकर Madras High Court ने एक अहम और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है और साफ कहा है कि ऐसे मामलों में कानून आंख मूंदकर नहीं बैठ सकता।
क्या है मामला?
बता दें यह मामला तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले का है, जहां एक महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी उसके साथ लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहा, शादी का भरोसा देता रहा और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत मांगी थी।
अदालत ने क्यों दिखाई सख्ती?
मामले की सुनवाई करते हुए Justice S. Srimathy ने कहा कि आधुनिक रिश्तों में अदालतों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, खासकर तब जब एक पक्ष महिला कानूनी रूप से ज्यादा असुरक्षित स्थिति में हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाएं पत्नी जैसी सुरक्षा अपने आप नहीं पातीं और इसी कानूनी खालीपन का दुरुपयोग कई बार पुरुष करते हैं। ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सेक्शन 69 BNS क्यों बना आधार?
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 को इस मामले में लागू करने योग्य माना। इस धारा के अनुसार, झूठे वादे या धोखे के आधार पर बनाया गया यौन संबंध अपराध की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि यदि शादी की मंशा शुरू से स्पष्ट नहीं थी या संभव ही नहीं थी, तो आरोपी कानून से बच नहीं सकता। इसी आधार पर अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ prima facie मामला बनता है और अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
आपको बता दें अपने आदेश में अदालत ने प्राचीन भारतीय अवधारणा गांधर्व विवाह का हवाला दिया, जहां स्त्री-पुरुष की आपसी सहमति ही संबंध का आधार होती थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति आधारित रिश्ते भारतीय समाज के लिए कोई नई या पश्चिमी सोच नहीं हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि आज के समय में गांधर्व विवाह को कानूनी मान्यता नहीं है। इसका संदर्भ केवल यह समझाने के लिए था कि सहमति वाले रिश्तों को अपने आप अनैतिक नहीं कहा जा सकता, लेकिन सहमति का दुरुपयोग अपराध बन सकता है।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
अदालत ने पुरुषों के दोहरे रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि रिश्ता चलने तक पुरुष खुद को ‘मॉडर्न’ बताते हैं, लेकिन रिश्ता टूटते ही महिला के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। कोर्ट के अनुसार, समाज और व्यवस्था अक्सर महिला को ही कटघरे में खड़ा कर देती है, जो खतरनाक प्रवृत्ति है और इसे रोकना जरूरी है।
फैसले का असर
यह आदेश लिव-इन रिलेशनशिप को शादी का दर्जा नहीं देता, लेकिन यह साफ संकेत देता है कि शादी का झूठा वादा अब सिर्फ निजी मसला नहीं, बल्कि कानूनी अपराध हो सकता है।
