क्यों बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं, क्या है बचाव के उपाय

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रांची। देश में पिछले दो दिनों से पुणे रोड एक्सीडेंट की चर्चा है। पुणे में एक नाबालिग ने अपनी तेज रफ्तार कार से दो आइटी इंजीनियरों को कुचल दिया।

दोनों की ही मौत मौके पर हो गई। कार चालक नाबालिग पूरी तरह नशे में था। मामला चर्चा में इसलिए आया कि जुबेनाइल कोर्ट ने उस नाबालिग को बेल देते हुए उसे निबंध लिखने को कहा।

दो साल पहले सितंबर के महीने में जाने-माने उद्योगपति साइरस मिस्त्री तो ऐसी भयावह सड़क दुर्घटना के शिकार बने कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

चार माह पहले राजधानी रांची के बूटी मोड़ में देर रात हुए एक सड़क हादसे में तीन युवकों की जान चली गई।

बीते बुधवार को एक भारी वाहन ने एक स्कूटी सवार को कुचल दिया। स्कूटी सवार की मौके पर ही मौत हो गई।

इसके बाद लोगों ने सड़क जाम कर दी और मुआवजे की मांग करने लगें। कुछ साल पहले ऐसे ही लोग सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के शव को सड़क पर रखकर मुआवजे के लिए सड़क जाम किये हुए थे।

तभी वहां से गुजरते हुए एक तेज रफ्तार ट्रक ने प्रदर्शनकारी नेता को ही कुचल दिया। ये कोई इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं।

भारत में हर साल करीब डेढ़ लाख लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। यह स्थिति तब है जब भारत में विश्व के तकरीबन 10 प्रतिशत वाहन ही हैं, लेकिन सड़क हादसों में एक चौथाई लोग भारत में जान गंवाते हैं।

ऐसे अनगिनत उदाहरणों और तथ्यों की कड़ी कहीं न कहीं सड़क सुरक्षा के बिंदु पर आकर जुड़ती है।

ये हमें यही बताते हैं कि सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे लिए तत्काल कितना महत्वपूर्ण हो गया है।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि हम सड़कों को सभी के लिए सुरक्षित कैसे बनाएं? सड़क हादसे क्यों होते हैं?

इसके मुख्यत: निम्न कारण हैं। अंधाधुंध रफ्तार, ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन, ड्रंकेन ड्राइव, चालक को नींद आना, खराब सड़कों या उन पर अतिक्रमण, ब्लैक स्पाट और गाड़ियों की खराब हालत।

भारत में हाइवे पर तत्काल चिकित्सा सहायता की अनुपलब्धता के कारण भी मौत के आंकड़ें ज्यादा हैं।

आइए अब विस्तार से जानते हैं कि बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण क्या हैं और इनका निवारण कैसे हो सकता है।

भारत हर साल 1.5 लाख मौतः

आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल करीब 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इनमें करीब 1.5 लाख मौत हर साल हो जाती है। जबकि करीब 3 लाख लोग मामूली या गंभीर रूप से घायल होते हैं।

खराब सड़केः

भारत में सड़के बन रही हैं, पर अभी भी ज्यादा सड़कें खास्ताहाल हैं। हमारे देश में सड़कों की स्थिति इतनी दयनीय है कि रास्ता चलते आप समझ भी नहीं पायेंगें कि सड़क में गड्ढे हो गए हैं या गड्ढों में ही सड़क बनी हुई हैI

ऊपर से सड़कें जगह-जगह ऊँची-नीची होना व दोनों साइड में कच्चा भाग एकदम गहरा होना भी दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण देता हैI

ट्रैफिक नियमों का उल्लंघनः

आम तौर पर देखा जाता है कि हम भारतीय ट्रैफिक नियमों के प्रति गंभीर नहीं होते, जो सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी वजह बनती है।

यातायात पुलिस तथा परिवहन विभाग, जिन पर नियमों के उल्लंघन को रोकने की जिम्मेदारी होती है, वे भी इसके प्रति गंभीर नहीं होते।

इस पर नियंत्रण के लिए नियमों में परिवर्तन करना होगा कि ऐसे किसी कारण से दुर्घटना होने पर दुर्घटना-ग्रस्त व्यक्ति जहां से वाहन लेकर चला था और दुर्घटना-स्थल तक के बीच में जितने भी चेक-पोस्ट पड़ें हों, उन सबके ड्यूटी-स्टाफ की गतिविधयों की जांच कर पूछकाथ की जाये।

ड्राइविंग में चूकः

आमतौर से भारी वाहनों को सड़क दुर्घटनाओं के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जाता है। जो कुछ हद तक सही भी है I

कई बार सड़क दुर्घटनाओं में वाहन चालकों की लापरवाही सामने आती है। कभी ड्रंकेन ड्राइव यानी शराब पीकर गाड़ी चलाना या तेज गति इसका कारण बनते हैं।

अनियंत्रित गति या बिना प्रशिक्षण के गाड़ी चलाने से भी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। कई बार अप्रशिक्षित चालकों द्वारा गाड़ी चलाने के कारण भी दुर्घटनाएं होती हैं।

संतोष का विषय है कि अभी हाल ही में मोटर व्हीकल अधिनियम में संशोधन कर इस सम्बन्ध में कई कड़े प्रावधान जोड़े गए हैं, जिनको यदि बाद में भी सख्ती से लागू करना जारी रखा गया तो उपरोक्त कारणों से होने वाली दुर्घटनाओं में कमी अवश्य देखने को मिलेगी I

लंबी ड्राइव और नींदः

बहुत सी सड़क-दुर्घटनाएं सुबह 3-4 बजे के आस-पास होती हैं। जब सारी रात नींद से लड़कर थक चुका ड्राइवर झपकियां लेने को विवश हो जाता हैI

इसके अलावा लम्बी दूरी तय करने के लिए कई बार ड्राईवर बिना रुके लगातार गाड़ी चलाता है, जो एक प्रकार से दुर्घटना को खुला निमंत्रण देने जैसा ही हैI

चूंकि इसको रोकने के लिए सरकार कुछ नहीं कर सकती, अतः यात्रियों को चाहिए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर सब मिलकर ड्राईवर को विश्राम लेकर ही गाड़ी चलाने के लिए राजी करें और अपने प्राण अनावश्यक रूप से खतरे में न डालेंI

इसके अलावा जागरूकता से ही इस समस्या का हल मिल सकता है।

ब्लैक स्पाटः

ब्लैक स्पाट रोड एक्सीडेंट की बड़ी वजह हैं। आम तौर पर किसी खतरनाक मोड़, ऐसा कटाव स्थल जहां सामने से आनेवाली गाड़ी न दिखे या ऐसा तिकोन जहां दो गाड़ियां एक साथ आमने सामने आ जाती हो, उस स्थल को ब्लैक स्पाट कहा जाता है।

ये ऐसी जगह है जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं। झारखंड में भी ऐसे कई स्पाट चिहिन्त हैं। इनमें जीटी रोड पर चौपारण के निकट एक मोड़ और रांची से खूंटी रोड में जोड़ा पुल के पास का मोड़ ज्यादा चर्चित हैं।

हालांकि राज्य में अब ब्लैक स्पाट को दूर करने के प्रयास शुरू हो चुके हैं।

सड़क दुर्घटना के अन्य कारणः

यातायात के नियम सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं, जिनका उल्लंघन दुर्घटनाओं का कारण बन जाता है, जैसे रात में बिना लाइट जलाए वाहन चलाना, हॉर्न खराब होने पर भी चलते रहना, रेड-लाइट पर बिना रुके निकलने का प्रयास करना, मोड़ दूर होने पर विपरीत दिशा से वाहन ले जाना, गाड़ियों में क्षमता से अधिक सवारी बैठा लेना आदिI

इन कारणों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जहां सम्बंधित वाहन स्वामियों व विभागीय अधिकारियों का दायित्व निर्धारित करना जरूरी है।

दोपहिया वाहनों की लापरवाहीः

आजकल दुपहिया वाहन जैसे मोटरसाइकिल, स्कूटर वगैरह से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या भी बहुत बढ़ गई है।

आजकर दोपहिया वाहनों के चालक ज्यादातर युवा होते हैं, जो रफ ड्राइविंग करते हैं। दुपहिया वाहनों पर दो से अधिक लोगों को बैठा कर चलते हैं।

आम तौर पर दो पहिया वाहन चालक हेलमेट पहनने से कतराते हैं। खास तौर पर युवा हेलमेट को बेकार की मुसीबत समझते हैं।

इसलिए भी छोटे वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर कैजुअल्टी ज्यादा होती है। इस कारण से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ऐसे वाहनों का चालान न करने वाले अधिकारियों पर सख्ती करनी होगी।

साथ ही, सघन जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को इस आचरण से मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता है।

सड़कों पर असामान्य गतिविधियां:

सड़कों पर अक्सर ही आसामान्य गतिविधियां भी दुर्घटना का कारण बन जाती हैं। कुछ लोग राजमार्गों का प्रयोग नाचते-गाते बारात ले जाने, जॉगिंग करने, सड़क किनारे आराम करने व खेलने तक के लिए करते हैंI

कई बार लोग विरोध प्रदर्शन के लिए सड़क जाम कर बैठ जाते हैं। ऐसे में हमेशा ही दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

कुछ मामलों में तो वाहन चालक का दोष भी नहीं होता और पैदल चलने वाले की लापरवाही दुर्घटना का कारण बन जाती हैI

भीड़भाड़ वाली सड़केः

भीड़भाड़ वाली सड़कें भारत में सड़क दुर्घटनाओं की एक प्रमुख वजह हैं। आम तौर पर देखा जाता है कि कई हाइवे भी भीड़भाड़ वाले इलाकों से होकर गुजरते हैं।

ये ऐसी जगह होती हैं, जहां वाहन चालक की मामूली भूल या सड़क पर गुजर रहे लोगों की लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन जाती है।

इसलिए एनएचआइ या स्टेट हाइवे डिपार्टमेंट को चाहिए कि उनकी सड़कों पर जहां भी भीड़भाड़ है, वहां या तो बाइपास बनाये या फ्लाईओवर बनाकर रास्ता निकाले।

हालांकि ऐसी सड़कों के किनारे रेलिंग बनाकर भी कुछ हद तक दुर्घटनाएं कम की जा सकती हैं।

जिम्मेदार कौनः

खराब सड़क, पुराने या जर्जर वाहन और ट्रैफिक नियमों आदि के लिए अलग-अलग विभागों में अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय हैं।

खराब सड़कों के लिए सरकार, संबंधित विभाग और संवेदक को ही लोग जिम्मेदार बताते हैं।

विभाग के अधिकारी और इंजीनियर तथा संबंधित संवेदक यदि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से करें, तो सड़कों की सूरत बदलते देर नहीं लगेगी।

आम लोगों की मानें, तो सरकार को चाहिए कि सड़क बनाने का ठेका देते समय एक निश्चित अवधि तक उसके रख-रखाव की जिम्मेदारी भी ठेकेदार या संवेदक कंपनी पर डाली जाए और यदि खराब सड़क के कारण कोई हादसा हो तो विभागीय कार्यवाही के साथ सम्बंधित ठेकेदार व अधिकारी, पीड़ित तथा उसके परिवार को क्षतिपूर्ति देने के लिए भी उत्तरदायी हों।

इसके अलावा पुराने और जर्जर वाहन यदि सड़क पर चल रहे हों, तब परिवहन विभाग के अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है कि वे इसे रोकें।

बावजूद इसके यदि सड़क पर ऐसे वाहन चलें, तो उनसे भी पूछा जाना चाहिए। वहीं हाइवे की बात करें, तो किसी भी ब्लैक स्पाट और खराब सड़क के लिए एनएचआइ के अधिकारी जिम्मेदार होते हैं।

उनकी यह जिम्मेदारी होती है कि वे पूरी सड़क दुरुस्त रखें। ब्लैक स्पाट को चिह्नित कर उसका निदान करें।

सड़क पर अतिक्रमण न हो ये भी सड़क से संबंधित विभाग के अधिकारी और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी होती है।

सड़क हादसों से बचाव में तकनीक का उपयोगः

भारत सरकार सड़क हादसों से बचने के लिए संभावित उपायों पर लगातार काम कर रही है। सरकार अब तकनीक का सहारा लेने पर विचार कर रही है।

सरकार का मानना है कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआइ तकनीक बड़ी सहायक हो सकती है।

वाहनों को एआइ से लैस करके उनकी ट्रैकिंग संभव है। इससे वाहन की ड्राइविंग और रफ्तार के पैटर्न पर नजर रखी जा सकेगी और ड्राइवर का संपर्क स्टीयरिंग व्हील से टूटते ही पता लगाकर ड्राइवर को सतर्क किया जा सकेगा।

यदि इसे जीपीएस से जोड़ दें और ‘जियो-फेंसिंग’ जैसी तकनीक का इस्तेमाल करें तो दुर्घटना आशंकित क्षेत्रों में वाहनों की अधिकतम गति को अपने आप ही नियंत्रित किया जा सकेगा।

इससे हादसे का खतरा कम हो जाएगा। इसी तकनीक का इस्तेमाल रात के वक्त या घने कोहरे के समय भी किया जा सकता है।

चूंकि ज्यादा सड़क हादसे ड्राइवर की थकान या झपकी लगने के कारण होते हैं, इसलिए इस मामले में सतर्क करने वाली तकनीकें विकसित करना उपयोगी होगा।

ऐसी तकनीकों में स्टीयरिंग व्हील के पैटर्न से लेकर ड्राइवर की आंखों और चेहरे की लगातार निगरानी की जाती है, ताकि उसकी थकान का पता चल सके।

इस प्रकार के सिस्टम को सभी ट्रकों और बसों के लिए अनिवार्य किया ही जाना चाहिए, क्योंकि उनके चालक अक्सर रात के समय और कई घंटों तक लगातार वाहन चलाते हैं।

विदेशों में हो रहे ये प्रयोगः

अन्य देशों के उदाहरणों पर गौर करें तो आस्ट्रेलिया ने प्रायोगिक तौर पर ‘इग्निशन लाकिंग सिस्टम’ लागू किया है, जिसमें जब ड्राइवर अपनी श्वास का सैंपल देता है, तभी उसकी गाड़ी स्टार्ट होती है।

अगर उसने शराब पी रखी है तो उसका वाहन चालू ही नहीं होगा। यह लॉक सिस्टम ड्राइवर की फोटो खींचकर अधिकारियों को सतर्क कर देगा।

सिंगापुर में एक स्टार्टअप है जो हेलमेट के लिए वायरलेस सेंसर बनाता है। यह चालक को पहुंचने वाली किसी भी चोट की खबर उसकी लोकेशन के साथ उसके परिवार और दोस्तों को देता है, जिससे उसका बचाव तत्काल संभव हो सकता है।

यह उन मामलों को कम कर देगा, जिनमें किसी व्यक्ति की जान समय पर मदद न मिल पाने के कारण चली जाती है।

ऐसे ही नई तकनीक के जरिये सड़कों को भी स्मार्ट बनाए जाने की जरूरत है और मानवीय निर्भरता को कम करते हुए ट्रैफिक नियमों को एआइ के इस्तेमाल से लागू किया जाना चाहिए।

एआइ पर आधारित आसान तरीकों से किसी भी ओवरलोडेड ट्रक और ट्राली को ट्रैक किया जा सकेगा और उनके आकार को देखकर उन्हें रोका जा सकेगा।

सड़कों पर रोशनी को कई गुना बेहतर किया जा सकता है। इसी प्रकार सड़क पर चल रहे पुराने और क्षतिग्रस्त वाहनों का पता भी एआइ का इस्तेमाल कर सुगमता से लगाया जा सकता है।

नि:संदेह तमाम सावधानी बरतने के बावजूद सड़क हादसों को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं, लेकिन उसके बाद लोगों की जान बचाने के उपाय तो किए ही जा सकते हैं।

दुर्घटना के बाद पहले घंटे को ‘गोल्डन ऑवर’ कहते हैं। यदि इस आरंभिक एक घंटे में प्राथमिक चिकित्सा मिल जाए तो दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की जान बचाने में मदद मिल सकती है।

इसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस लेते समय लोगों का ‘फर्स्ट एड’ टेस्ट पास करना अनिवार्य बनाना होगा।

स्कूलों और कालेजों में भी युवाओं को आकस्मिक प्राथमिक चिकित्सा में दक्ष बनाना होगा, ताकि वे किसी भी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के अस्पताल पहुंचने से पहले जीवन रक्षा चिकित्सा प्रदान करने में सक्षम हो सकें।

कुछ समय पहले दुबई में यह देखा गया कि वहां सड़क दुर्घटना में प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करने के लिए ड्रोन का उपयोग किया गया। भारत में भी इसे आजमाया जा सकता है।

सड़क सुरक्षा के कानूनः

लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों की रोकथाम के लिए हर साल 11 से 17 जनवरी तक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है।

सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को सड़क सुरक्षा के महत्व को समझाना होता है।

यह सप्ताह लोगों को ये समझाने के लिए है कि सड़क सुरक्षा को लेकर हमारी जिम्मेदारी क्या है और हमें कैसे सड़क पर सुरक्षित रहना चाहिए।

सबसे पहली बार राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह सन 1989 में मनाया गया था। भारत में मनाये जाने वाले सड़क सुरक्षा सप्ताह दौरान मुख्य रूप से इन बातों की जानकारी दी जाती है।

यातायात के नियमों का पालन

सड़क पर चलते समय यातायात के नियमों का पूरा पालन करें। सड़क पर लगे संकेतांकों का सही अनुसरण करें, ताकि आपके साथ कोई हादसा ना होने पाए।

इन संकेतों में सिग्नल्स, जेब्रा क्रॉसिंग, और ट्रैफिक लाइट शामिल हैं।

वाहनों से उचित दूरी बनाकर रखें

सड़क पार करते समय वाहनों के लिए सुरक्षित दूरी बनाए रखें। यह सुनिश्चित करेगा कि वाहन आपको किसी तरह का नुकसान ना पहुंचा सकें।

दिशा का रखें ध्यान

सड़क पार करते समय हमेशा सही साइड में चलें। इसके साथ ही ट्रैफिक की दिशा पर भी ध्यान रखें, ताकि हादसा ना होने पाए।

वाहन चालक रखें इसका ध्यान

अगर आप बाइक सवार हैं, तो हेलमेट पहनें और गाड़ी चालकों को हमेशा सीट बेल्ट पहनकर रखनी चाहिए।

जेब्रा क्रॉसिंग का प्रयोग

अगर पैदल चल रहे हैं तो हमेशा जेब्रा क्रॉसिंग का ही इस्तेमाल करें। इसी की मदद से आप हादसों से दूर रहेंगे।

ध्यानपूर्वक सड़क पार करें

सड़क पार करते समय हमेशा सतर्क रहें। आसपास के वाहनों और और ट्रैफिक लाइटों का खास ध्यान रखें।

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