सब्ज़ी-भाजी बेचने वालों का मन का मैला नहीं हो सकता!

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सुशोभित

सब्ज़ी-भाजी बेचने वालों को मैंने हरदम उत्फुल्ल ही पाया। मुझे ऐसे किसी सब्ज़ीवाले की याद नहीं आती, जो बददिमाग़ या उद्दंड हो।

घमंड तो ख़ैर वो बेचारा क्या गिलकी-तोराई खाकर करेगा, पर इस बात का ग़ुरूर भी उसमें नहीं दीखता कि बड़ी सजल, टटकी, हरीतिमा का व्योपारी बना फिर रहा है।

इनमें से बहुतों के खेत में उगी सब्ज़ियां भी ये नहीं होतीं, मण्डी वग़ैरा से बड़े सवेरे ले आते हैं और फेरी लगाकर बेचते हैं।

कमाई का अनुपात अधिक नहीं, लेकिन बड़े ही संतोषी जीव मालूम होते हैं। इसका रहस्य क्या होगा?

मैं अकसर इनसे चर्चा-संवाद करने का जतन करता हूँ कि कौन गाँव से आए हो, किस मण्डी से यह सब ले आए।

वे बड़े चाव से सब बताते हैं, मानो मैंने सच में ही कोई बड़े काम की तफ़सील के लिए पूछा हो। जबकि मैं तो यों ही बात चलाने के लिए चर्चा छेड़ देता हूँ।

“जै रामजी की काका, कईं हाल-चाल” पूछने पर हमेशा “सब ठीक-ठाक, बस आपकी कृपा है” का प्रत्युत्तर मिला है।

सब्ज़ियाँ ताज़ी हों न हों, उनके लिए तो वे संसार की सर्वोत्तम वस्तु हैं। किसी सब्ज़ीवाले को अपनी सब्ज़ियों की सराहना करते सुनें, आप पाएँगे कि उसको उनमें कोई अवगुण दीख ही नहीं सकता।

हाँक लगाने का अंदाज़ सुनें- एक तीखी, तारसप्तक को चींथने वाली आवाज़, जिसमें “आलू ले जाओ”, “टमाटर भर लो”, “हाट उठे की बेला है, सांझ ढले का भाव है”, “एक लम्बर चीज है, खा लो” की मनुहार! उनकी बोलचाल की बोली अलग होती है, हाँक लगाने का स्वर अलग।

बड़े अभ्यास से यह हाँक सधती होगी। इन्हें रोक लो, मोल-तौल करके भी साग-तरकारी न लो तो वो किसी सरकारी महक़मे के बाबू-अफ़सर की तरह बुरा न मानेंगे कि नाहक़ मेरा समय ज़ाया किया।

समय के ज़ाया होने वाली बात ही इनके ख़याल में नहीं होती, ये अनंतकाल में जीते हैं। जबकि सब्ज़ियाँ तक सुबह की शाम को बासी हो जाती हैं!

सुबह-साँझ के दाम में आधे का अंतर तो आ ही जाता है, दियाबत्ती की वेला की तरकारी ढेर के ढेर उठ जाती है।

वो लोग अपना ठेला ख़ाली करके हँसी-ख़ुशी घर लौटते हैं। बच्चों के लिए कुछ चना-चबैना, रेवड़ी, नमकीन वग़ैरा ले जाते होंगे?

घर पर बीवी-बच्चों पर बिगड़ते होंगे या वहाँ भी वही विनयशीलता की मूरत बने रहते हैं?

चन्द्रकान्त देवताले की एक कविता में एक अर्दली अपने साहब के बच्चों को तो बड़ा दुलार करता है, दौड़-दौड़कर चीलगाड़ी दिखलाता है, पर अपने बच्चों को कोसता है, मानो वे उसके दुश्मन हों।

पर वो अर्दली है, भाजीवाला नहीं है। मैं यह मानने को राज़ी नहीं होता कि ये सरलमना सब्ज़ मनुज केवल सौदा-सुलुफ़ के लिए वैसे भले जीव बनते होंगे।

मेरे इस भरोसे में भी मेथी की भाजी सरीखी प्रगाढ़ आश्वस्ति कहीं होगी कि- जो सब्ज़ी-तरकारी सरीखी सुंदर वानस्पतिक वस्तु बेचता है, दिनभर उसकी कोमलता, हरीतिमा को छूता, सहलाता, संजोता-सजाता है, वो मन का मैला नहीं हो सकता!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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