सखुआ के फूल खिल उठे हैं। पलाश के फूल तो पहले से ही लालिमा बिखेर रहे हैं। ये बता रहे हैं कि प्रकृति पर्व सरहुल आ गया है।
इसे लेकर चौक-चौराहे और सड़कें लाल और सफेद झंडों पर पट गए हैं। हर तरफ माहौल सरहुल की मस्ती छा गई है।
जोश और उल्लास में डूबे लोग अभी से ही इस महापर्व की तैयारियों में जुट गये हैं। सरना झंडे को देखकर पता चल रहा है कि इस पर्व के आने में अब कुछ ही पल बचे है।
ये पर्व 11 अप्रैल से शुरू होकर 13 अप्रैल तक चलेगा। आदिवासियों के सबसे बड़े और मुख्य त्योहारों में से एक सरहुल पर्व की तैयारियां हर ओर देखी जा सकती है।
पाहन लोग विधि से होनेवली पूजा की तैयारियों में जुटे हैं।
तो चलिये जानते हैं कि सरहुल पर्व का क्या है महत्व।
सरहुल
सरहुल को प्रकृति पर्व भी कहा जाता है। वो इसलिए यह पूरी तरह प्रकृति को समर्पित है। वैसे तो आदिवासियों का प्रत्येक त्योहार ही आदिवासियों को समर्पित है।
सरहुल में भी प्रकृति की पूजा की जाती है। प्रकृति (जल, जंगल और जमीन) की पूजा की जाती है। यह नए साल की शुरुआत का पर्व है।
यह पर्व झारखंड, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।
प्रकृति पर्व: सरहुल
सरहुल का अर्थ दो शब्दों से मिलकर बना है- सर और हुल
सर: यह शब्द सखुआ (साल पेंड़) के फूल को सरई कहा जाता है।
हुल: इसका अर्थ क्रांति से है यानि की बदलाव।
इस तरह सखुआ फूल की क्रांति को ही सरहुल कहा गया है। यह पर्व वसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति में विशेष बदलाव के साथ मनाया जाता है।
मुंडारी, संथाली और हो भाषा में सरहुल को बा या बाहा पोरोब, खड़िया भाषा में जांकोर, कुड़ुख में खद्दी या खेखेल बेंजा कहा जाता है।
तो वहीं नागपुरी, पंच परगनिया, खोरठा और कुरमाली भाषा में इसको सरहुल कहा जाता है।
पतझड़ के मौसम के बाद प्रकृति खुद को नए पत्तों और फूलों के आवरण से खुद को सजा लेती है, आम के मंजर, सरई और महुआ के फूलों से पूरी फिजा महक उठती है।
क्या है मान्यताएं..
महाभारत में सरहुल से जुड़ी कई कहानी मिलती है। जब महाभारत का युद्ध चल रहा था तब आदिवासी समुदाय ने युद्ध में कौरवों का साथ दिया था, जिस कारण कई मुंडा सरदार पांडवों के हाथों मारे गए थे।
इसलिए आदिवासियों के शव की पहचान के लिए उनके शरीर को साल के पत्तों और टहनियों से ढक दिया गया था।
महाभारत के युद्ध के बाद ऐसा देखने को मिला कि जिन शवों को साल के पत्तों से ढका गया था वो नहीं सड़े और उनकी अवस्था ठीक थी, लेकिन जो अन्य चीजों से ढके हुए थे वो शव सड़ गए थे।
इस घटना के बाद आदिवासियों में साल के पेड़ों और पत्तों के प्रति उनकी अटूट आस्था और गहरा विश्वास जाग उठा। उनकी यही आस्था वर्तमान रुप में सरहुल पर्व के रूप में जाना जाता है।
पूजन की विधिः
चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाने वाला प्रकृति पर्व सरहुल की मुख्य पूजा उनके धर्मगुरु यानी पहान करवाते हैं।
वो अखड़ा में विधि-विधान पूर्वक अपने आदिदेव सींग बोंगा की पूजा करते हैं। इसके एक दिन पहले प्रकृति पूजक उपवास कर केकड़ा और मछली पकड़ने जाते हैं।
इस दौरान सुख समृद्धि के लिए रंगा हुआ मुर्गा की बलि देने की परंपरा निभाई जाती है। इसमें ग्राम देवता को रंगा यानी रंगवा मुर्गा अर्पित किया जाता है।
पहान ईष्ट देवता से बुरी आत्मा को गांव से दूर भगाने की मनोकामना करते हैं। पूजा के दौरान पहान रस्म के पहले दिन घड़े का पानी देखकर वार्षिक वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं।
इस पूजा के बाद शाम को विभिन्न मौजा के पाहनों के द्वारा ढोल-मांदर बजाते हुए कुएं या तालाब से दो घड़ा पानी लाकर जल रखाई की रस्म निभाई जाती है।
गांव के नदी, तालाब या कुएं से दो घड़े में पानी लाकर सरना स्थल की उत्तर और दक्षिण दिशा में रखा जाता है। पानी की गहराई को साल(सखुआ) के तने से नापा जाता है।
जिसके बाद दूसरे दिन घड़े में पानी को उसी तने से नापा जाता है। घड़े में पानी के कम होने या नहीं होने की स्थिति पर उस साल वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
निकलती है भव्य शोभा यात्राः
आदिवासी समाज मानता है कि उनका लोकनृत्य उनकी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा है। सरहुल के मौके पर पूरे झारखंड में नृत्य उत्सव का आयोजन किया जाता है।
महिला पुरूष नृत्य करते हुए समूह में निकलते हैं। पूजा स्थल से निकल कर ढोल और मांदर की थाप पर थिरकते हुए शहर की परिक्रमा करते हैं।
सरना झंडों के सथा निकले इस जुलूस की शोभा देखते ही बनती है।
महिलाएं सफेद रंग की लाल पाड़ की साड़ी धारण करती हैं। सफेद रंग पवित्रता और शालीनता का और लाल रंग संघर्ष का प्रतीक माना जाता है।
सफेद रंग आदिवासी समुदाय के सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल रंग ईष्टदेव बुरुबोंगा का प्रतीक है। इसलिए सरना का झंडा भी लाल और सफेद रंग का ही होता है।
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