RIMS referral process
रांची। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम से मरीजों को रिम्स भेजने की प्रक्रिया अब और व्यवस्थित और पारदर्शी होगी। रिम्स प्रबंधन ने रेफरल की नई मानक कार्यप्रणाली (SOP) तैयार की है, ताकि मरीजों को बिना पर्याप्त इलाज या जरूरी तैयारी के रिम्स न भेजा जाए। इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर मरीजों को रेफर करने से पहले उन्हें स्थिर (स्टेबलाइज) किया जाए और इलाज की पूरी जानकारी के साथ ही संस्थान भेजा जाए।
क्या कहना है रिम्स प्रबंधन का?
रिम्स प्रबंधन का कहना है कि कई मामलों में मरीजों को बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के ही रेफर कर दिया जाता है, जबकि कई बार गंभीर मरीजों को सही तरीके से स्थिर किए बिना ही रिम्स भेज दिया जाता है। इससे इमरजेंसी विभाग पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए नई एसओपी लागू की जा रही है, जिससे रेफरल प्रक्रिया अधिक जवाबदेह और सुव्यवस्थित बने।
निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक आयोजित
इस मुद्दे को लेकर रिम्स में निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में मेदांता हॉस्पिटल, सैमफोर्ड हॉस्पिटल और माँ राम प्यारी हॉस्पिटल के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और रेफरल प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। साथ ही अस्पतालों की ओर से सुझाव भी दिए गए। हालांकि मणिपाल हॉस्पिटल और पारस हॉस्पिटल के प्रतिनिधि बैठक में शामिल नहीं हो सके।
रिम्स प्रबंधन के अनुसार
रिम्स प्रबंधन के अनुसार संस्थान में आने वाले कुल मरीजों में करीब 40 प्रतिशत मरीज निजी अस्पतालों से रेफर होकर आते हैं। इनमें से ज्यादातर मरीज शाम 5 बजे से रात 9 बजे के बीच भेजे जाते हैं। इमरजेंसी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर में कुल 5,994 मरीज इमरजेंसी में पहुंचे थे, जिनमें करीब 1,200 मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी।
वहीं जनवरी में इमरजेंसी में आने वाले मरीजों की संख्या बढ़कर 6,038 हो गई, जिनमें 1,328 मरीज वेंटिलेटर पर थे। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि रिम्स में गंभीर मरीजों का दबाव काफी अधिक रहता है। ऐसे में नई एसओपी लागू होने से उम्मीद जताई जा रही है कि रेफरल प्रक्रिया बेहतर तरीके से संचालित होगी और मरीजों को समय पर और प्रभावी इलाज मिल सकेगा।








