निजी आस्था नहीं राजनीति है धर्म

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सुशोभित

जावेद अख़्तर ने एक बार बहुत पते की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि देखें तो धर्मों में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति बहुत हद तक नास्तिक भी होता है।

बस एक फ़र्क़ है। वो दूसरे धर्मों के लिए नास्तिक है, अपने धर्म के लिए आस्तिक है। यानी उसको दूसरों के धर्मों की बुराइयाँ तो दिन की रौशनी की तरह साफ़ दिखती हैं, पर अपने धर्म की एक बुराई नहीं दिखती।

हर धर्मालु एथीस्ट है- दूसरे धर्मों के लिए। आधा सफ़र उसने तय कर लिया है। अपने धर्म- यानी जिस धर्म में संयोगवश उसका जन्म हो गया है- में भी उसको बुराई दिखने लगे तो वह पूरा एथीस्ट हो जायेगा।

भारतवासियों के साथ समस्या यह है कि इन्होंने ख़ुद को धर्म पर इतना ज़्यादा आश्रित कर लिया है कि अब दूसरों को तमीज़ में रहने को कहें तो किस मुँह से कहें?

यानी बहुसंख्यक समाज के बहुत सारे लोग इस पर एकमत होंगे कि सार्वजनिक स्थलों पर नमाज़ नहीं पढ़ी जानी चाहिए, पर इस बात को कहें किस मुँह से, जब आये दिन ही सार्वजनिक स्थलों पर उनकी स्वयं की शोभायात्राएँ, जुलूस, यज्ञ-हवन, अखण्ड रामायण, सुंदरकाण्ड पाठ, कावड़ यात्राएँ आयोजित होती रहती हैं? अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरों को क्या दोष दें?

या तो किसी भी तरह की रिलीजियस प्रैक्टिस सार्वजनिक रूप से न हो, लेकिन तब यह नियम सबों पर एकसाथ लागू हो जावेगा। या यह खुलकर कहा जाये कि हम कर सकते हैं पर तुमको नहीं करने देंगे, क्योंकि देश हमारा है!

लेकिन तब संविधान का अनुच्छेद 25 इसमें बाधा डालेगा, जिसमें इस तरह की बात नहीं कही गई है। अनुच्छेद 25 भारतवासियों को उनके धर्मपालन की इजाज़त देता है- और मेरा मत है कि यह एक ग़लत प्रावधान है।

लोगों को सार्वजनिक रूप से धर्मपालन की इजाज़त नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अव्वल तो धर्म एक मूढ़ता है। लेकिन अगर वह मूढ़ता है, तब भी कोई उसे निजी स्पेस में करना चाहे तो क्या किया जावे? समस्या तब है जब उससे सार्वजनिक व्यवस्था में बाधाएँ आने लगें।

एक नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री ने आदेश जारी किया था कि प्रदेश में लाउडस्पीकरों के उपयोग पर पाबंदी लगाई जायेगी। तालियाँ बज उठीं कि आते ही क्या सही और कठोर फ़ैसला लिया है।

क्योंकि इसकी व्याख्या मित्रों ने इस तरह से की थी कि अब अज़ान आदि की चिल्लपौं की नकेल कसेगी। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद अयोध्या में राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई और गली-गली में सुंदरकांड पाठ हुए, अखण्ड रामायण हुई, ध्वनि-विस्तारक पर धार्मिक गाने बजे- और लाउडस्पीकरों पर पाबंदी वाला शिगूफ़ा सरकार की नाक के नीचे ही कूड़ेदान में फेंक दिया गया।

इतना ही नहीं, उलटे वह आदेश देने वाली सरकार ख़ुद ऐसे अनेक कार्यक्रमों में शरीक हुई, जिनमें शोर बरपा था!
प्रश्न यह है कि धर्म अगर एक निजी आस्था है, तो वह अपनी सार्वजनिक अभिव्यक्ति के लिए इतनी व्याकुल क्यों रहती है?

उत्तर यह है कि धर्म एक निजी आस्था नहीं है, यह एक राजनीति है। यह संख्याबल का प्रदर्शन है। यह वर्चस्व का उद्घोष है। यह सामूहिकता से उत्पन्न होने वाली उद्दंडता और अशिष्टता का व्याकरण है।

धर्म बिलकुल भी निजी वस्तु नहीं है- जैसे प्रेम एक निजी वस्तु होती है, एकान्त की खोज करने वाली, शयनकक्ष में रूपायित होने वाली।

धर्म एक सार्वजनिक उपक्रम है, एक संस्थान है और वह किसी राजनैतिक-सैन्यवादी संगठन की ही तरह लोगों को एकजुट, उन्मत्त, गर्वित करने का काम करता है। एक अंधा भी इस सच्चाई को साफ़ देख सकता है।

मेरा निजी मत है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के प्रावधानों को सख़्त बनाते हुए धर्मपालन की आज़ादी केवल निजी स्पेस में दी जानी चाहिए।

समस्या यह है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग चाहते हैं, इस नियम को अल्पसंख्यकों पर लागू किया जाये और उन्हें इससे मुक्त रखा जाये। लेकिन यह तो होने से रहा।

सड़क नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं है। मैं तो कहूँगा कि कोई भी जगह नमाज़ पढ़ने की नहीं है, क्योंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और धर्म एक फ़रेब है।

लेकिन अगर कोई नमाज़ पढ़ने के निर्धारित, निजी स्थान पर यह खटकरम कर बैठे और उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग न हो तो मैं कहूंगा, लोकतंत्र में मनुष्यों को मूढ़ताएँ करने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की परिभाषा ही यही है कि मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खों के द्वारा शासन!

प्रश्न यह है कि जिस सख़्ती से पुलिस ने नमाज़ में ख़लल डाला, क्या उसी तरह से वह सार्वजनिक स्थलों पर संचालित होने वाली कथा, यज्ञ-हवन, शोभायात्रा आदि में भी ख़लल डाल सकती थी?

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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