बेटे के स्कूली जूतों पर पॉलिश

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सुशोभित

नन्हे पैरों के लिए नन्हे-से जूते थे, इतने कि हथेली पर नन्ही गिलहरी की तरह दुबक जाएं।

सवा चार बरस के पैरों के लिए जूतों की एक जोड़ी। काले रैग्ज़ीन के स्कूली जूते।

बोनसाई के बौने दरख़्तों को देखकर मन में जैसा कौतुक जगता है, वैसा ही विस्मय जगाने वाले- नन्हे, छोटे, प्यारे!

अगर मैं चींटी के आकार का होऊँ तो दियासलाई मुझे दरख़्त जैसी दिखाई देगी। माचिस की डिबिया रेलगाड़ी जैसी। रूई का फाहा बादल सरीखा। गेंद पृथ्वी-सी।

लेकिन चूँकि मैं पाँच फ़ीट ग्यारह इंच लम्बा पुरुष हूँ, इसलिए मुझे वे जूते नन्हे मालूम पड़ रहे थे।

लेकिन बेटे के पैरों में तो वे एकदम फ़िट थे। उसके लिए वे जूते उतने ही बड़े थे, जितने बड़े उसके पाँव थे।

और उसके पाँव उतने ही बड़े थे, जितने कि सवा चार साल के बच्चे के होने चाहिए।
जूतों पर धूल जमी थी।

यह धूल घर से स्कूल और स्कूल से घर के सौ फर्लांग के फ़ासले को पैरों को धरती पर घिसते हुए, रगड़ते हुए, कंकड़-पत्थरों को ठोकर मारते हुए चलने से जमा की गई पूँजी थी।

क्योंकि मेरे जूतों पर तो वैसी कोई धूल नहीं थी। मैं तो बड़ी ऐहतियात से चलता था, पैर जमाते हुए।

कहीं सुना था कि फ़रिश्तों के पंखों पर नमक जम जाए तो पंख झड़ जाते हैं और वे इंसान बन जाते हैं।

और बच्चों के जूतों पर धूल ना जमे तो वे जूते नहीं कहलाते, समुद्रतट पर लंगर डाले किसी जहाज़ की उदास मिनिएचर तस्वीर जैसे लगते हैं।

एक दिन स्कूल से लौटकर बेटे ने कहा- “पापा, मेरे जूतों पर इतनी धूल है, आप इन्हें पॉलिश क्यों नहीं करते?” पापा ने कहा- “हाँ बेटा, कर दूंगा।”

बेटे ने जूते निकालकर रख दिए, अगली सुबह फिर से पहनने तक मुल्तवी। पापा दफ़्तर चले गए। लेकिन दिनभर “हाँ बेटा, कर दूंगा” का वायदा ज़ेहन में गूँजता रहा।

रात देरी से पापा लौटे। कपड़े बदले, मुँह धोया। खाना खाया, चौका बुहारा। पॉलिश की डिबिया उठाई, पॉलिश का ब्रश उठाया।

डिबिया का ढक्कन खोला, गोल्डन फ़ॉइल को हटाया, और पॉलिश की महक को अपने नथुनों में भर लिया।

अगर पिछली सदी में नईपेठ में मनसुखभाई वढेरा की दुकान पर इन्हीं पापा ने जूतों की मरम्मत का काम नहीं किया होता, तो उन्हें वह पॉलिश सबसे पहले एनसीसी कैम्प के दिसम्बर की याद दिलाती, जहाँ सुबह जागकर बूटों और कमरपट्टों पर पॉलिश करना अनिवार्य था।

ग़ालिबन, पापा को जूतों पर पॉलिश करने का अच्छा अभ्यास था- अब्राहम लिंकन की तरह!

किंतु हाथों को फ़र्मों की तरह बरतकर जैसे पापा अपने जूतों को हाथों में पहन लिया करते थे, बेटे के नन्हे जूतों को उस तरह पहनना कठिन था।

लिहाजा अंगुलियों का सहारा लेकर उन नन्हे जूतों पर पॉलिश की कालिमा मली गई, जैसे रात्रि!
फिर धीरे-धीरे उस कालिमा को ब्रश से सहलाया गया, जैसे चाँदनी!

जब तक कि सफ़ेद रौशनी का एक बित्ता जूतों की नाक पर नहीं उग आया!

रात के अढ़ाई से कम क्या बजे होंगे। बेटा सो रहा था। बेटे का स्कूल बस्ता भी सुस्ता रहा था। बस्ते के भीतर कम्पास में पेंसिलें स्वप्न देख रही थीं। स्वप्न में वे लहराते हुए पेड़ बन गई थीं!

और यहाँ पापा बेटे के जूतों पर पॉलिश कर रहे थे। क्योंकि पापा ने दोपहरी को वादा किया था- “हाँ बेटा, कर दूंगा।”

एक ऐसा वादा, जिसे पाने वाला कब का भुला चुका, लेकिन करने वाला दिनभर भूल नहीं पाया था।

पापा ने नन्हे जूतों को दुलारा और उनकी नियत जगह पर रखकर सो गए। सुबह हुई। जूतों की नाक पर सफ़ेद रौशनी का जो बित्ता उगा हुआ था, वो और फैल गया। इतना कि चिलक की तरह बेटे की आँखों में चुभने लगा।

तब उसने आँखें खोलीं और क्या देखता है- उसके जूते तो ब्लैक पर्ल की तरह चमचमा रहे हैं!
उस दिन बहुत ख़ुशी से यूनिफ़ॉर्म पहनी गई, उस दिन स्कूल जाना इतना बुरा नहीं लगा।

क्या उस दिन बेटे ने गत्ते के किसी ख़ाली डिब्बे को देखकर उसे ठोकर मारने से ख़ुद को रोक लिया होगा?

पता नहीं। लगता तो नहीं। चमचमाते जूतों से चाल-ढाल में नज़ाक़त आ जाए, वैसी सिफ़त, वैसा मिज़ाज बच्चों का नहीं होता।

फ़रिश्तों के पंखों पर नमक जम जाना और बच्चों के जूतों पर धूल नहीं जमना- एक जैसी ही तो त्रासदियाँ हैं!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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