सुशोभित
एक नेता ने कुछ दिनों पहले गाय को चारा खिलाते हुए तस्वीरें खिंचवाई थीं और सोशल मीडिया पर डाली थीं।
मजमेबाज़ नेता है, हर काम कैमरे के सामने करता है। निजी से निजी क्षणों की नुमाइश करता है। और भारत की जनता तमाशबीन है। ये इन दोनों की राम मिलाई जोड़ी हो गई।
जनता ने फ़ोटो देखकर वाहवाही की कि देखो, नेता गोमाता की सेवा कर रहा है। फिर वही नेता हाल ही में एक जगह गया और भाषण देकर आया कि आज देश की डेयरी इंडस्ट्री तेज़ी से बढ़ रही है और इसको हमें नम्बर वन पर लेकर आना है।
तमाशबीन जनता ने फिर तालियाँ बजाईं। उनमें से किसी ने ये सवाल नहीं पूछा कि एक तरफ़ गोमाता की सेवा और दूसरी तरफ़ गायों पर अत्याचार की पराकाष्ठा करने वाली डेयरी इंडस्ट्री को बढ़ावा- ये कैसे मुमकिन है?
जिस देश में प्रबुद्ध जनता नामक संस्था का लोप हो जाता हो, जिसमें शिक्षा, तार्किकता, बौद्धिकता, पत्रकारिता का स्तर शोचनीय हो और जो देश दुनिया में पाखण्ड-शिरोमणि हो, वहाँ पर यही होता है।
दूध का धंधा तो ज़ोरों से चल रहा है, पर दूध कहाँ से आता है? आसमान से तो बरसता नहीं। दूध थनों में उतरता है।
किसके थनों में, और कब? जो औरतें यह पोस्ट पढ़ रही हैं, वो अच्छी तरह से जानती हैं कि दूध थनों में कब और क्यों उतरता है। प्रकृति की व्यवस्था है।
पेट में बच्चा हो तो थन में दूध आता है, उस बच्चे के लिए। यहाँ तक तो ठीक है कि एक ग्राम-स्वराज्य वाली स्थिति में अगर दुधारू जानवर का बच्चा उसका सारा दूध नहीं पी पाता तो शेष बचा दूध मनुष्य अपने पोषण के लिए उपयोग कर लेते हैं।
लेकिन माँ के उस दूध की एक संगठित इंडस्ट्री? उसका अरबों रुपयों का कारोबार? और उस कारोबार की बेमाप माँग की पूर्ति के लिए परदे के पीछे चल रहा शोषण, क्रूरता, अत्याचार का घिनौना खेल- यह गाय को रोटी देकर अपने कर्त्तव्य से पल्ला झाड़ लेने वाली भारत देश की जनता जानना नहीं चाहती, न ही उस पर सोचना चाहती है। वो बस केवल अपने तात्कालिक हितों की पूर्ति करके ताली बजाना चाहती है।
पर जनता को सोचना ही पड़ेगा, इसका कोई विकल्प नहीं। सीधा-सा सवाल है। गाय और भैंस तब तक दूध नहीं देगी, जब तक उसके पेट में बच्चा नहीं डाला जायेगा।
ये बच्चा उसके पेट में कहाँ से आता है, ये पहला सवाल। ऐसे कितने बच्चे गाय और भैंस अपने जीवनकाल में जन सकती है, जो वह आजीवन दूध देती रहे, ये दूसरा सवाल।
अगर गाय का दूध उसका बच्चा पी लेगा तो कारोबार में घाटा होगा ये सोचकर क्या मुनाफ़ावीर गाय को उसके बच्चे से दूर नहीं करते होंगे, उसका मुँह नहीं बाँध देते होंगे, ये तीसरा सवाल।
जब गाय और भैंस बच्चे जनने और दूध देने की अवस्था में नहीं रह जायेगी और कारोबार के लिए लाभकारी नहीं रह जायेगी, तब उसका क्या होगा, यह चौथा सवाल।
और सबसे बड़ा सवाल- टनों लीटर दूध उत्पन्न करने वाली गायों और भैंसों के बच्चे उत्पादन की इस प्रक्रिया में उत्पन्न होने के बाद कहाँ पर जा रहे हैं? क्या वे पैदा होते ही हवा में गुम हो जा रहे हैं?और इसके बाद सोचिये कि सड़कों पर ये आवारा कहलाने वाले दुधारू जीव अचानक कहाँ से अवतरित होते हैं?
उनके कानों में उनका क्रमांक बताने वाले डेयरी के ईयर-टैग्स क्यों लगे होते हैं? वे जीव हैं या कमोडिटी हैं?
ट्रकों में लदकर गायें किन राज्यों में तस्कर हो रही हैं और क्यों चेकपॉइंट्स पर उन राज्यों की पुलिस भी उन्हें नहीं रोकती, जिन राज्यों में सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी पार्टी की सरकारें हैं? और भैंसों का क्या हो रहा है?
गोरी गाय की जान तो एक बार उन प्रांतों में बच भी जाये जहां गोवध ग़ैरक़ानूनी है, काली भैंस को तो सौ फ़ीसदी काटा जा रहा है।
बीफ़ का निर्यात तेज़ी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेज़ी से जितनी तेज़ी से डेयरी इंडस्ट्री बढ़ रही है। और वर्गीज़ कुरियन तो कहता ही था कि देश में गोवध को क़ानूनी बनाया जाये, ताकि हम डेयरी इंडस्ट्री के ‘वेस्टेड प्रोडक्ट्स’ यानी बूढ़ी गायों, बैलों, बछड़ों को खुलेआम काट सकें, ताकि हमारा बिज़नेस प्रोफिटेबल बना रह सके।
ये तमाम सवाल आप लोगों के दिमाग़ में क्यों नहीं आते? क्योंकि आप इस बारे में सोचना नहीं चाहते। क्योंकि इससे आपको बेचैनी महसूस होती है, आपको अपनी आदतें बदलनी पड़ेंगी, कुछ त्याग करना होगा, कुछ मुनाफ़ा गँवाना होगा- ये सब मुश्किल है।
सोशल मीडिया पर पाखण्डी नेता की गाय को घास खिलाती तस्वीरों पर लाइक दे आने से ही जब काम चल जाता हो तो कुछ और क्यों करें?
मुर्दा मूर्ति से ही मन बहल जाता हो तो जीवित प्राणी की चिंता भारत-देश को क्यों कर होने लगी?
लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं









