मार्क्स के सर्वहारा

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सुशोभित

प्रोलिटेरियट- यह कार्ल मार्क्स के दर्शन का आधार-पद है। इसे ही सर्वहारा या श्रमजीवी भी कहते हैं।

मार्क्स ने इसे रिवोल्यूशनरी क्लास बताया है, क्योंकि- जैसा कि मार्क्स-एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो’ में कहा था- “रूलिंग क्लास की ऊपरी परतों को पलटे बिना यह सर्वहारा वर्ग हिल तक नहीं सकता!”

कोई दो सौ साल पहले गढ़ी गई यह थ्योरी आज कितनी कारगर या प्रासंगिक है, इसके लिए कुछ परिप्रेक्ष्यों को समझना होगा

प्रोलिटेरियट वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस (उत्पादन के औज़ार) नहीं हैं। यानी अगर वह काम न करे तो भूखों मरेगा।

उसके पास वैल्यू के रूप में अपना श्रम या कौशल भर है, जिसे बेचकर वह आजीविका चलाता है।

बूर्ज्वा वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस हैं और उसे आजीविका के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं।

मार्क्स के समय में यह कारख़ाने का मालिक था, आज सीईओ, एमडी, डायरेक्टर, चेयरमैन, और बेनेफिशियरी क्लास के तमाम मुफ़्तख़ोर परजीवी इसी वर्ग में आते हैं।

पेटी-बूर्ज्वा वह है, जिसके पास मीन्स ऑफ़ प्रोडक्शंस तो हैं, लेकिन वह ख़ुद भी काम करता है, जैसे किसी छोटी दुकान का संचालक।

इसके हित सर्वहारा से ज़्यादा बूर्ज्वा से जुड़े होते हैं। लुम्पेनप्रोलिटेरियट वह है, जो नियतिवंचित है और औपचारिक-अर्थव्यवस्था के दायरों से बाहर संचालित होता है, जैसे ठग, अपराधी, भिखारी, नट, वेश्याएँ।

इन सबके कारण समाज में आर्थिक आधार पर विभिन्न वर्ग निर्मित होते हैं और इन वर्गों में अपने हितों की रक्षा के लिए टकराव (क्लास-स्ट्रगल) चलता है।

प्रोलिटेरियट में जब वर्गचेतना (क्लास-कांशियसनेस) जागती है तो वह अपनी जातीय और साम्प्रदायिक चेतना से मुक्त होता है और सत्ताधीश यह नहीं चाहते, जो कि पूँजीपतियों के वित्तपोषण से फलते-फूलते हैं।

धर्म इस तंत्र में अफ़ीम का काम करता है। वह सर्वहारा को उसकी वर्गचेतना से मुक्त कर उसके शोषण में अपना योगदान देता है।

एक कारख़ाने में अगड़ा और पिछड़ा, हिन्दू और मुसलमान, यहूदी और ईसाई साथ काम कर रहे हो सकते हैं, लेकिन वे ख़ुद को एक वर्ग के रूप में नहीं देखते। और यह बात कारख़ाने के मालिक के हित में है।

पूँजी, धर्म और राजनैतिक सत्ता का चोली-दामन का सम्बंध है। ये तीनों बिज़नेस-पार्टनर्स हैं। यह हक़ीक़त दिन की रौशनी की तरह इतनी साफ़ है कि अंधा भी देख सकता है।

धर्म और राष्ट्रवाद की अफ़ीम चटा दी जाये तो ग़रीब आदमी भी धनकुबेर की शोभायात्रा में नाचकर और तालियाँ बजाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगता है- क्योंकि उसको उसकी क्लास-कांशियसनेस से वंचित कर दिया गया है।

मार्क्सवादी थ्योरी में बेस और सुपरस्ट्रक्चर की बात आती है। प्रोडक्शन आधार है, और कल्चर, रिलीजन, मीडिया, स्टेट ये सुपरस्ट्रक्चर हैं।

अर्थतंत्र कल्चर को भी प्रभावित करता है, मीडिया को भी, स्टेट को भी, और रिलीजन उसका गठबंधन-सहयोगी है।

ये अकारण नहीं है कि देश में एक तरफ़ सत्ताधीश रोज़ मंदिरों में जाकर तस्वीरें खिंचवाने का ढोंग करता है और दूसरी तरफ़ सत्ता के उपकरण अदालत में यह अर्ज़ी देते हैं कि कृपया उन धनकुबेरों के नामों का खुलासा न करें, जिन्होंने चुनाव लड़ने के लिए मोटी रकम (इलेक्टोरल बॉन्ड) दी है।

रिलीजन का सुपरस्ट्रक्चर इसी तरह से प्रोडक्शन के बेस को केमाफ़्लेज करता है। जनता को मगन रखने के लिए रिलीजन से अच्छी चटनी कोई दूसरी नहीं चटाई जा सकती।

एक तरफ़ देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयाँ नहीं हैं और गाँवों में बच्चे किसी विद्यालय-भवन के बिना खुले आकाश के नीचे बैठकर पढ़ते हैं, दूसरी तरफ़ धनकुबेर अपने बेटे की प्री-वेडिंग में अंतरराष्ट्रीय-नर्तकी को एक नाच के 74 करोड़ रुपए देता है- आर्थिक विषमता का यह खुल्ला खेल फ़र्रुख़ाबादी की तर्ज़ पर नंगा-नाच एक ऐसे समाज में ही सम्भव है, जिसमें प्रोलिटेरियट को उसकी वर्गचेतना से वंचित कर दिया गया हो और जिसमें सरकार का बूर्ज्वा को पूर्ण-प्रश्रय प्राप्त हो।

कार्ल मार्क्स के समय में इंडस्ट्री सबसे प्रमुख क्षेत्र था, वर्तमान में सर्विस अग्रणी सेक्टर बन गया है।

मार्क्स के युग में कारख़ाने के मज़दूर, भूदास, बंधुआ श्रमिक प्रोलिटेरियट थे, आज इन सबके साथ ही (भूदास अब नहीं होते) गिग वर्कर्स, कॉल सेंटर में काम करने वाले, ब्लू कॉलर जॉब्स करने वाले, मामूली नौकरियों के वेतनयाफ़्ता विशेषकर निजी क्षेत्र के कर्मचारी प्रोलिटेरियट की श्रेणी में आने चाहिए। लेकिन इंटरनेट के उद्भव के बाद और एआई के ज़माने में सुपरस्ट्रक्चर अब बहुत बहुआयामी, जटिल और व्यापक हो गया है- इसे सर्वहारा की बुद्धि आसानी से बेध नहीं सकती।

कार्ल मार्क्स के समय में मोनार्की थी, आज डेमोक्रेसी है- मैं समझता हूँ आज का सर्वहारा इस मौजूदा परिप्रेक्ष्य में रिवोल्यूशनरी-क्लास नहीं हो सकता, वह इतना ज़रूर कर सकता है कि अपनी वर्गचेतना के प्रति सजग हो (इसके लिए शिक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण औज़ार है) और लोकतंत्र के उपकरणों का लाभ उठाकर स्टेट को भरसक प्रश्नांकित करे।

मीडिया इस कार्य में प्रोलिटेरियट का मुखपत्र होना चाहिए, लेकिन अब वह न केवल सत्तातंत्र का भोंपू बन चुका है, बल्कि पूँजीवादी-उपभोगवादी शैली की बूर्ज्वा संस्कृति को ही नित्यप्रति प्रचारित करता रहता है।

और लेखक? वो आज इस फिक्र में घुल रहा है कि विज्ञापन से धन कैसे कमाऊँ, ऐसी किताब लिखकर कैसे बिकूँ जो यथास्थिति का गुणगान करे और अपनी जीवनशैली को किसी कम्पनी के सीईओ-सरीखी कैसे बनाऊँ?

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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