Madhabi Puri Buch: माधबी पुरी बुच को क्लीन चिट, लोकपाल ने सभी शिकायतों को किया खारिज [Madhabi Puri Buch gets clean chit, Lokpal dismisses all complaints]

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Madhabi Puri Buch:

नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत के लोकपाल ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट से जुड़े आरोपों के संबंध में सेबी की पूर्व चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच को क्लीन चिट दी है। उसने बुच के खिलाफ दायर सभी शिकायतों को खारिज कर दिया है। भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी संस्था को जांच का वारंट जारी करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला। लोकपाल ने जस्टिस ए.एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय बेंच की ओर से पारित एक विस्तृत आदेश में कहा कि आरोप ‘अनुमानों और धारणाओं’ पर आधारित थे।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत अपराधों को लागू करने के लिए किसी भी सत्यापन योग्य सामग्री का अभाव था। आदेश में निष्कर्ष निकाला गया कि शिकायतें जांच शुरू करने के लिए कानूनी सीमा को पूरा नहीं करती हैं। इसलिए खारिज कर दी गईं।

Madhabi Puri Buch: पांच प्रमुख आरोपों की हुई जांच

लोकपाल की ओर से जांच की गई शिकायतों में हिंडनबर्ग रिपोर्ट से प्राप्त सामान्य सामग्री साझा की गई। लोकपाल ने सबमिशन की समीक्षा करने के बाद बुच के खिलाफ लगाए गए पांच प्रमुख आरोपों की जांच की। हिंडनबर्ग रिपोर्ट में बुच और उनके पति धवल बुच से जुड़े कुछ वित्तीय लेनदेन और संभावित हितों के टकराव के आरोप सामने आए थे। इनमें अडानी समूह की कंपनियों से संपर्क रखने वाले फंडों में कथित निवेश का जिक्र था।

इसके अलावा, महिंद्रा एंड महिंद्रा (एमएंडएम) और ब्लैकस्टोन इंक जैसी कंपनियों से कंसल्टेंसी फीस के जरिये ‘क्विड प्रो क्वो’ (एक पक्ष की ओर से दूसरे पक्ष के लिए कुछ करने के बदले में कुछ प्राप्त करना) के दावे किए गए थे। वोकहार्ट से प्राप्त किराये की आय को भी इसी ‘क्विड प्रो क्वो’ की प्रकृति का बताया गया था। यह भी उल्लेख किया गया था कि 2017 और 2024 के बीच आईसीआईसीआई बैंक के ईएसओपी (कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना) की बिक्री से लाभ प्राप्त हुआ।

Madhabi Puri Buch: जांच के बाद लोकपाल ने निकाला निष्कर्ष

एमएंडएम और ब्लैकस्टोन से संबंधित नियामक मामलों से अलग रहने का कथित दिखावा भी सवालों के घेरे में था।इन आरोपों की व्यक्तिगत रूप से जांच करने के बाद लोकपाल ने निष्कर्ष निकाला कि किसी में भी कोई योग्यता नहीं है या सबूतों से पुष्टि नहीं होती है।
लोकपाल के आदेश में कहा गया है, ‘…शिकायतों में आरोप अधिक अनुमानों और धारणाओं पर आधारित हैं और किसी भी सत्यापन योग्य सामग्री से समर्थित नहीं हैं… अपराधों के तत्वों को आकर्षित नहीं करते हैं… ताकि जांच का निर्देश दिया जा सके। उसी के अनुसार, इन शिकायतों का निपटारा किया जाता है।’

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