अगाती (लक्षद्वीप) : लक्षद्वीप के शांतिपूर्ण माहौल के बीच ‘पंडारम भूमि’ पर मौजूद पेड़ों की गिनती को लेकर स्थानीय निवासियों और प्रशासन के विवाद बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि भूमि स्वामित्व का एक रूप पंडाराम भूमि वर्तमान प्रशासक के कार्यभार संभालने और यह दावा करने के बाद लक्षद्वीप में एक विवाद बन गया है कि ये संपत्तियां सरकार की हैं।
उन्होंने दावा किया कि जिस समझौते के तहत 1884 में उन्हें जमीनें सौंपी गई थीं, उसके अनुसार यदि वे 40 वर्षों तक उन पर कब्जा बनाए रखते हैं, तो स्वामित्व द्वीपवासियों के पास चला जाता है।
केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा कि लोगों की आशंकाएं ‘परिकल्पना’ पर आधारित हैं।
जलील ने कहा, “हाल तक सरकार ने जब भी हमारे कब्जे में मौजूद पंडारम भूमि को अपने उपयोग के लिए अधिग्रहित किया, तब उसने हमें मुआवजा दिया था।
यहां तक कि जब सरकार ने हमारी जमीन पट्टे पर ली थी, तब भी हमें संपत्ति का किराया दिया गया था।”
उन्होंने बताया कि जब अगाती हवाई अड्डे के निर्माण के लिए ऐसी भूमि का अधिग्रहण किया गया था तो लोगों को मुआवजा दिया गया था।
जलील ने कहा, “लोग मुआवजे के कारण और प्रशासन के इस वादे की वजह से भी अपनी जमीन छोड़ने पर सहमत हुए थे कि हवाई अड्डे का कोई और विस्तार नहीं किया जाएगा।
तब उन्होंने कहा कि हवाई अड्डा रक्षा उद्देश्यों के लिए है और लोगों से वादा किया कि ऐसा कोई विस्तार नहीं किया जाएगा।”
उन्होंने कहा, “यदि आप रनवे की बनावट को देखते हैं तो आप समझ सकते हैं कि रनवे के एक छोर पर उत्तरी सागर और दूसरे छोर पर दक्षिणी सागर है, इसे आगे बढ़ाने की कोई गुंजाइश नहीं है।”
जलील का दावा है कि भारत सरकार ‘ट्रंक बॉक्स’ में 30 लाख रुपये नकदी लेकर आई थी और जमीनें हासिल करने के बदले लोगों को मुआवजे के रूप में वह नकदी सौंपी थी, तब वह वहां मौजूद थे।
एक सेवानिवृत्त स्कूल प्रधानाचार्य और सामाजिक कार्यकर्ता अहमद कोया ने कहा, “वर्तमान प्रशासक के पद पर आसीन होने के बाद सब कुछ बदल गया।
इससे पहले तक हम शांतिपूर्ण जीवन जी रहे थे। मुझे लगता है कि वे अब हमें हमारी जमीन से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।”
अगाती द्वीप के निवासी हसन कोया ने कहा कि उनके पास प्रशासन द्वारा दी गई जमीन का स्वामित्व प्रमाण पत्र है और कलेक्टर के आदेश के आधार पर उन्हें वर्ष 2000 में आवास ऋण दिया गया था।
उन्होंने आरोप लगाया, ‘दो दिन पहले, प्रशासन के अधिकारी आए और मेरी संपत्ति में नारियल के पेड़ों को चिह्नित किया, जिसमें मेरे घर के परिसर के अंदर के पेड़ भी शामिल थे।
मुझे सूचित किए बिना यह सब किया गया।” स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रशासन पंडारम भूमि पर नारियल के पेड़ों की गिनती पर लगी उच्च न्यायालय की रोक का उल्लंघन कर रहा है और संभवतः काटने के लिए पेड़ों को चिन्हित किया जा रहा है।
अहमद कोया ने आरोप लगाया, “उन्होंने नारियल के पेड़ों को काटना शुरू कर दिया है जो द्वीप के लोगों की जीवन रेखा हैं। उन्होंने लोगों को सूचित नहीं किया या उन्हें कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।
हम केरल उच्च न्यायालय गए और इसपर रोक लगवाई। लेकिन, रोक के बावजूद प्रशासन ने पंडारम भूमि पर स्थित पेड़ों को चिह्नित करने का काम जारी रखा है।”
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