विवेकानंद कुशवाहा
बिहार सामाजिक न्याय की धरती के रूप में जानी जाती है। पूरे देश में सबसे पहले पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर्पूरी ठाकुर जी के मुख्यमंत्री रहते बिहार में लागू हो गया था। उनका दिया फॉर्मूला पिछड़ों और अतिपिछड़ों को विभक्त/सशक्त करता है। देश का सबसे पहला दलित मुख्यमंत्री भी बिहार ने दिया।
पिछले 33 वर्षों से बिहार में जनता परिवार से निकले तथाकथित समाजवादियों की सरकार है। कांग्रेस के खिलाफ जनता परिवार के उदय का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय था, जिसमें जनता परिवार के लोगों ने जनसंघ और बीजेपी का भी साथ लिया था। फिर आज ऐसी क्या स्थिति बनी है कि सामाजिक के रखवाले ही सामाजिक अन्याय करने को तैयार हैं?
दरअसल, बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की भीतरिया इच्छा पीएम बनने की है। एक बिहारी होने के नाते और पुराने सामाजिक रिश्ते के नाते मुझे इसमें भला क्यों आपत्ति होगी? मैंने दर्जनों दफा खुद इस बात की वकालत की है कि पीएम नरेंद्र मोदी को को कोई सेल्फमेड नेता हरा सकता है, लेकिन नीतीश कुमार ने खुद एक बयान देकर मेरे जैसे कुछ लोगों की आपत्ति मोल ली है।
राजद समर्थक वोटरों का दिल जीतने के लिए ही सही, 2025 में तेजस्वी यादव को अपनी पार्टी/गठबंधन का नेतृत्व सौंपने का बयान, नीतीश कुमार की सामाजिक न्याय की धारा के विपरीत है। ऐसा नहीं है कि मुझे तेजस्वी यादव से कोई निजी खुन्नस है। मैं तेजस्वी यादव को संभावनाशील नेता मानता हूं। वे बिहार के सीएम भी कभी जरूर बन जायेंगे। दिक्कत यह भी नहीं है कि उन्हें राजनीति विरासत में मिली है, बल्कि दिक्कत सीधे पार्टी के सबसे बड़े नेता की कुर्सी विरासत में मिलने से है।
तेजस्वी यादव को पूरा हक है कि वे राजनीति करें, लेकिन उनके दल से उनके पिताजी के बाद उनकी माताजी और अब उनके सीएम बनने की बात सामाजिक अन्याय है। अगर आप कहेंगे कि जनता चुनती है, तो मैं कहूंगा कि जनता विधायक चुनती है, मुख्यमंत्री नहीं। अगर आप कहेंगे कि यदुवंशी समाज की संख्या एक जाति के रूप में सबसे ज्यादा है, तो मैं कहूंगा कि कोई दूसरा सक्षम यदुवंशी नहीं है राजद में इनके इतर?
ऐसे में नीतीश कुमार से कम से कम यह अपेक्षा न थी कि वे भाजपा का भय दिखा कर सामाजिक अन्याय के एजेंडा को आगे बढ़ाएं। पीएम बनने के मोह में उन्होंने जो नयी गोटी फेंकी है, वही वक्त आने पर उनकी कुर्सी के पांव तोड़ेंगे। बिहार के लोगों ने तमाम अलट-पलट के बावजूद नीतीश कुमार को इसीलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे बिहार के सभी कमजोर लोगों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। लेकिन, यदि नीतीश कुमार सत्ता को लौटा कर वहीं ले जाना चाहते हैं, जहां से उठा कर बिहार की जनता ने सत्ता को उनके हाथ सौंपा था, तो यह पुनः मुसको भव: बिहार के कमजोर लोग शायद ही स्वीकार करें। भले उसके लिए उनको उसके साथ जाना पड़े, जिसके साथ वे कभी नीतीश कुमार की ही वजह से जाते रहे हैं।
सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल पर यदि आप बिहार में वोट मांगते हैं, तो 2025 के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व अतिपिछड़े, कुशवाहा, दलित या मुस्लिम में से किसी एक के पास होना चाहिए। आप इसे मेरा जातिवाद कहेंगे, तो मैं इसे सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की मांग कहूंगा। ऐसा भी नहीं है कि कोई अति पिछड़ा/कुशवाहा/दलित/मुस्लिम में से कोई बिहार का सीएम बन गया, तो इन जाति/वर्ग घर के खजाने भर जायेंगे। ऐसा होने से उन जाति/वर्गों में सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। यह मौका एक-एक सभी जाति वर्गों के संभावनाशील राजनीतिज्ञों को मिलना चाहिए।
इससे पहले कि आगे की बात लिखूं, एक बार बिहार के अब तक के 23 मुख्यमंत्रियों की सूची और उनके जाति/वर्ग पर नजर दौड़ा लीजिए।
वर्ष 1946 से 1989 तक
————
1. श्रीकृष्ण सिंह : 15 वर्ष (तीन टर्म) : कांग्रेस (भूमिहार)
2. दीपनारायण सिंह : 17 दिन : कांग्रेस (राजपूत)
3. बिनोदानंद झा : 2 वर्ष : कांग्रेस (ब्राह्मण)
4. कृष्ण बल्लभ सहाय : 4 वर्ष : कांग्रेस (कायस्थ)
5. महामाया प्रसाद सिन्हा : 10 माह : जन क्रांति दल (कायस्थ)
6. सतीश प्रसाद सिंह : 5 दिन : संसोपा (कुशवाहा)
7. विंदेश्वरी प्रसाद मंडल : 49 दिन : संसोपा (यादव)
8. भोला पासवान शास्त्री : 10 महीने (तीन टर्म) : कांग्रेस (पासवान-अजा.)
9. हरिहर सिंह : 4 महीने : कांग्रेस (राजपूत)
10. दरोगा प्रसाद राय : 10 माह : कांग्रेस (यादव)
11. कर्पूरी ठाकुर : 2.5 वर्ष (दो टर्म) : सोशलिस्ट व जनता पार्टी (नाई)
12. केदार पांडेय : 1 वर्ष, 3 माह : कांग्रेस (ब्राह्मण)
13. अब्दुल गफूर : 1 वर्ष, 9 माह : कांग्रेस (मुस्लिम)
14. जगन्नाथ मिश्रा : 5 वर्ष, 4 माह (तीन टर्म) : कांग्रेस (ब्राह्मण)
15. रामसुंदर दास : 11 माह : जनता पार्टी (रविदास-अजा.)
16. चंद्रशेखर सिंह : 1 वर्ष, 7 माह : कांग्रेस (राजपूत)
17. बिंदेश्वरी दुबे : 3 वर्ष : कांग्रेस (ब्राह्मण)
18. भागवत झा आजाद : 1 वर्ष : कांग्रेस (ब्राह्मण)
19. सत्येंद्र नारायण सिन्हा : 8 माह : कांग्रेस (राजपूत)
———
वर्ष 1990 से 2023 तक
———
20. लालू प्रसाद यादव : 7 वर्ष (दो टर्म) : जनता दल व राष्ट्रीय जनता दल (यादव)
21. राबड़ी देवी : 8 वर्ष (तीन टर्म) : राष्ट्रीय जनता दल (यादव-महिला)
22. नीतीश कुमार : 17 वर्ष (जारी है…) (आठ टर्म) : समता पार्टी, जदयू (कुर्मी)
23. जीतन राम मांझी : 9 माह : जदयू (मुसहर-अजा.)
बिहार में पहला विधानसभा चुनाव 1952 में संपन्न हुआ था और उस समय देशभर में कांग्रेस को कोई चुनौती नहीं थी। आजादी से लेकर 1967 तक बिहार में कांग्रेस का शासन रहा। इस दौरान भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ सभी जाति से मुख्यमंत्री बने। पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री जन क्रांति दल के महामाया सिन्हा भी कायस्थ जाति से थे।
वर्ष 1968 में कुशवाहा जाति के सतीश प्रसाद सिंह के रूप में बिहार को पहला ओबीसी मुख्यमंत्री मिला, लेकिन वे सिर्फ इसलिए मुख्यमंत्री बनाये गये थे, ताकि बीपी मण्डल को विधान परिषद की सदस्यता दिलाकर उनके मुख्यमंत्री बनने की राह बना सकें। सतीश प्रसाद सिंह महज पांच दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहे, जिसमें तीन दिन उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय में काम करने का अवसर मिला। इसके बाद यादव समाज से आने वाले बीपी मण्डल बिहार के सीएम बने।
कांग्रेस ने इस ओबीसी राजनीति के उभार के काट के लिए कई दांव चले। इसी क्रम में पासवान समाज के भोला पासवान शास्त्री को बिहार का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। इसी क्रम में बिहार के पिछड़ों और गरीबों के दर्द को समझने वाले नेता कर्पूरी ठाकुर को दो टर्म मिलाकर लगभग 2.5 वर्ष के लिए बिहार का सीएम बनने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने बिहार में सामाजिक न्याय का दीप जला दिया। इसके बावजूद सामाजिक न्याय की लौ ठीक से जल नहीं पायी थी।
वर्ष 1990 में जनता दल की ओर से यादव समाज से आने वाले लालू प्रसाद को बिहार की कमान मिली। लालू प्रसाद यादव ने अपने पहले कार्यकाल में बिहार के वंचितों के मुंह में बोली दी, उस समय तक लालू प्रसाद यादव के पीछे तृवेणी (यादव, कोइरी और कुर्मी) की ताक़त थी। जल्द ही सत्ता और पावर के स्वाद ने उनका रवैया अपने सहयोगियों के लिए तल्ख कर दिया था। वे अपनी कुर्सी की सुरक्षा के लिए खुद को एमवाई-आर में समेटने लगे। इधर एक-एक कर उनके सहयोगी टूटने लगे। फिर कुर्मी चेतना रैली हुई और नीतीश कुमार भी लालू यादव से अलग हो गये। फिर चारा घोटाला की धमक ने लालू प्रसाद की राजनीति की दिशा को बदल कर रख दिया।
जेल जाते समय राबड़ी देवी जी को सत्ता सौंप कर लालू जी ने संदेश दे दिया कि उन्हें पार्टी के लोगों से अधिक परिवार पर भरोसा है। फिर बिहार के लॉ एंड ऑर्डर का क्या हाल हुआ। वह किसी से छिपा नहीं है। उस काल में जनता को हुई पीड़ा को नीतीश कुमार हर चुनाव में भुनाते रहे।
लेखक : वरिष्ठ पत्रकार हैं।









