परिसीमन पर बढ़ता विवाद: चेन्नई में 6 राज्यों की सरकारों की बड़ी बैठक [Growing dispute over delimitation: Big meeting of governments of 6 states in Chennai]

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चेन्नई, एजेंसियां। भारत में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों सहित कुछ अन्य राज्य सरकारों ने कड़ा रुख अपना लिया है। इस मुद्दे पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की अगुवाई में आज चेन्नई में संयुक्त कार्रवाई समिति (Joint Action Committee) की पहली बैठक आयोजित की गई है। इस बैठक में केरल, तेलंगाना, कर्नाटक और पंजाब के मुख्यमंत्री या उनके प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं।

बैठक में कौन-कौन होंगे शामिल?

तमिलनाडु सरकार ने 7 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस बैठक में आमंत्रित किया था। अब तक केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान बैठक में भाग लेने के लिए तैयार हो चुके हैं। कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी. के. शिवकुमार भी इस बैठक में सम्मिलित होंगे। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा की बीजू जनता दल और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि भी इस बैठक में भाग ले रहे हैं।

क्या है मामला

भारत में संसदीय सीटों के पुनः वितरण (Delimitation) की प्रक्रिया पिछले 50 वर्षों से स्थगित है, लेकिन 2026 में इसे लागू किए जाने की संभावना है। परिसीमन के तहत लोकसभा सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा।

उत्तर भारतीय राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई है, जिससे वहां लोकसभा सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। दक्षिण भारतीय राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना आदि—ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, लेकिन इससे उनके संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी आने की संभावना है।

एम. के. स्टालिन ने क्या कहा

दक्षिण भारतीय राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण की उनकी नीतियां अब उनके लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। तमिलनाडु के सीएम एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में इस मुद्दे पर संयुक्त मोर्चा बनाकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाई जा रही है।

बैठक का मुख्य लक्ष्य

संयुक्त कार्रवाई समिति की इस बैठक का मुख्य लक्ष्य परिसीमन की प्रक्रिया को रोकने या इसके लिए वैकल्पिक समाधान सुझाने की रणनीति तैयार करना है। इसमें यह भी देखा जाएगा कि क्या इस मुद्दे पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

क्या होगा आगे?

इस बैठक के बाद दक्षिण भारतीय राज्यों की आगे की रणनीति पर निर्णय लिया जाएगा। यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील हो सकता है और संभवतः राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनेगा।

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