फ़िरोज़ शाह तुग़लक को बाग़ लगवाने का बड़ा शौक़ था!

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सुशोभित

यों चस्का तो उसे इमारतें तामीर करवाने का भी बहोत था। अपनी किताब ‘फ़ुतूहते फ़िरोज़शाही’ में उसने अपनी इमारतों के बारे में ख़ूब चाव से बतलाया है। लेकिन इमारतें तो हर सुल्तान बनवाता है, बाग़ हर कोई नहीं लगवाता।

एक ‘तारीख़े फ़िरोज़शाही’ बरनी ने लिखी है, दूसरी अफ़ीफ़ ने। और इन दोनों ने ही फ़िरोज़ के बाग़ों के बारे में बहोत ब्योरेवार बतलाया है।

फ़िरोज़ ने दिल्ली और उसके आसपास के इलाक़ों में कोई 1200 बाग़ बनवाए थे। ये अधिकतर फलों के बाग़ थे।

इनमें गुलाब और सेवन्ती की बहार तो रहती ही, अनार, चितूरी, अलख़ाने भी उगाए जाते और सात क़िस्मों के अंगूर तो एक जितल प्रति सेर के भाव बिकते!

मुग़लों के नपे-तुले चारबाग़ के उलट ये बाग़ बहुत घने और बीहड़ होते, इतने कि बाज़ दफ़े इनमें सुल्तान शिकार करने चला आता था!

फ़िरोज़ ने अपने बाग़ों की देखभाल और उनसे होने वाली आमदनी के लिए अपनी हुकूमत में मुख़्तलिफ़ एक महकमा ही बना दिया था।

लेकिन आज उसके बारह सैकड़ा बाग़ों में से एक ही बचा है, जहाँ दिल्ली के दक्खन में ‘बड़ा लाव का ग़ुम्बद’ सिर उठाए खड़ा है!

इस्लाम में जन्नत को नहरों वाले ‘बहिश्त’ की तरह सोचने का तसव्वुर है, शायद इसीलिए बाग़ों के आशिक़ फ़िरोज़ शाह ने मरने से पहले सनद लिखवाई कि मुझको किसी बाग़ में ही दफ़नाया जाय!
मैं ‘बड़ा लाव का ग़ुम्बद’ वाले फ़िरोज़ शाह के आख़िरी सलामत बाग़ में शाम के झुटपुटे में टहला हूँ तो उन्हीं पैरों से चलकर ‘हौज़ ख़ास’ भी गया हूँ, जहाँ एक मक़बरे में सो रहा है फ़िरोज़!

पलभर में नाराज़ होकर गरदनें उतरवाने का हुक्म देने वाले सुल्तान की नींद में आज ख़लल तो पड़ता होगा, जब चुम्बनों के लिए मौक़े और मुद्दत की तलाश में चहचहाते हुए चले आते हैं नौजवां प्रेमी- हाथों में थामे हाथ- छज्जों में उतरवाते तस्वीरें!

और गुनगुनाते हुए क़बूतरों के जोड़े- जिनकी बज़्म ही एक ऐसी शै है, जो कभी उठती नहीं- तख़्त उलट जाते हैं, बाग़ उजड़ जाते हैं!

याद रखिएगा के दुनिया के सुल्तान चाहे जितने बाग़ बनवा लें, उन पर हुकूमत तो मोहब्बत के मारों की ही चलती है!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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