कर्नाटक में शानदार जीत से कांग्रेस को मिला जोश का बूस्टर डोज

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शंभु नाथ चौधरी

रांची : कर्नाटक के चुनावी नतीजे आ गए हैं। शानदार जीत से कांग्रेस को जोश का एक बूस्टर डोज मिला है। दूसरी तरफ हार्डकोर हिंदुत्व और मोदी के करिश्माई नेतृत्व के बूते चुनावी रणों में रनों की बौछार करने वाली बीजेपी के लिए इन नतीजों ने चिंतन-मंथन की खुराक दी है। आइए, समझते हैं कि इस नतीजे की वजहें क्या हैं और आने वाले दिनों में देश-प्रदेश की सियासत के लिए इसके संकेत और मायने क्या हैं।  पहले इस रिजल्ट के कारकों की पड़ताल करने की कोशिश करते हैं। पहली बात यह कि कांग्रेस ने इस बार कर्नाटक का चुनाव पूरी तरह लोकल मुद्दों पर केंद्रित रखा और रणनीति बनाने से लेकर उन्हें अमली जामा पहनाने के लिए लोकल चेहरों पर भरोसा किया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से आते हैं। अपने गृह राज्य में चुनाव के नजरिए से उन्होंने जो फैसले लिए, उसपर पार्टी के किसी नेता ने कोई दखल नहीं दी। राहुल गांधी ने खड़गे पर भरोसा रखा। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार- इन दो बड़े स्थानीय चेहरों को पार्टी ने समान अहमियत दी। खड़गे दलित वर्ग से आते हैं। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के कर्नाटक में अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। बेहतरीन तालमेल से सभी ने अपने प्रभाव क्षेत्रों में जो अभियान चलाया, वह कारगर रहा।

दूसरी बात यह कि कांग्रेस ने इस बार रणनीतिक तौर पर कर्नाटक में पांच वायदे बड़े साफ शब्दों में किए और इन्हें जनता तक स्पष्ट रूप में पहुंचाने में वह सफल भी रही। इन पांच वायदों में हर परिवार को 200 यूनिट तक बिजली फ्री,

परिवार चलाने वाली महिलाओं को 2000 रुपये प्रति माह देने, सभी महिलाओं के लिए फ्री बस सर्विस देने,  ग्रेजुएट युवाओं को 3000 रुपये प्रतिमाह और बीपीएल परिवारों को हर महीने 10 किलो प्रति व्यक्ति चावल देने के वायदे शामिल थे। बीजेपी ने इन्हें रेबड़ी बांटने वाले वायदे बताए, लेकिन सच तो यह है कि दक्षिण के राज्यों में इस तरह के वायदों से जनता को लुभाने की परिपाटी अक्सर कारगर रही है।

तीसरी अहम बात यह कि भाजपा ने दक्षिण भारत में पहली बार कर्नाटक चुनाव में हिंदुत्व को चुनावी एजेंडे के तौर पर अपनाया था। मगर कर्नाटक की जनता ने इस मुद्दे को नकार दिया है। बजरंग दल पर बैन को बजरंग बली से जोड़ना हो या फिल्म केरल स्टोरी को मुद्दा बनाना हो, भाजपा नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंदू वोटों का पोलराइजेशन नहीं हुआ। उल्टे बजरंग दल पर बैन की बात करके कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को अपने पाले में पोलराइज लिया। कांग्रेस ने 75 प्रतिशत के आरक्षण का दांव चलकर दलित, ओबीसी, लिंगायत वोटर्स को अपने पाले में करने में कामयाबी हासिल की।

राहुल गांधी ने इस चुनाव में पुरानी गलतियां नहीं दोहराईं। भाजपा चुनावी रैलियों में उनकी जुबान फिसलने का इंतजार करती थी और इस मुद्दे बनाकर उन्हें पप्पू साबित कर देती थी। इस बार राहुल गांधी ने जनसभाओं से ज्यादा बसों में सफर करके, बाइक की सवारी करके, लोगों के बीच बैठकर भोजन करते हुए इंटरपर्सनल और ग्रुप चुनावी कम्युनिकेशन का फार्मूला अपनाया और यह कारगर साबित हुआ। कुछ महीनों पहले राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से जम्मू कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी। इस यात्रा का सबसे ज्यादा समय कर्नाटक में ही बीता। ये राहुल गांधी की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा रहा। इस यात्रा के जरिए राहुल ने कर्नाटक में कांग्रेस को मजबूत किया।

भाजपा का कर्नाटक में सीएम बदलकर एंटी इन्कंबेंसी को निष्प्रभावी करने का दांव इस बार उल्टा पड़ा। बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से भाजपा में आंतरिक कलह के हालात बने।  बसवराज बोम्मई मंत्रिमंडल के मंत्रियों पर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और भाजपा इनका जवाब देने में नाकामयाब रही। 12 मंत्रियों का चुनाव हारना इस बात का सबूत है। कांग्रेस ने भाजपा के बागियों को अपने साथ कर लिया। चुनाव में इसका पार्टी को फायदा भी मिला।

कर्नाटक नतीजे के सियासी निहितार्थ की बात करें तो सबसे मजबूत संकेत यही है कि 2024 का लोकसभा चुनाव भी पिछले दो चुनावों की तरफ एकतरफा होने की जो बात कही जा रही थी, उसके आसार अब नहीं लग रहे। जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, हिमाचल के बाद कर्नाटक की जीत ने कांग्रेस को बूस्टर डोज दे दिया है। इससे पार्टी को एक मोमेंटम मिलेगा और अगर वह इसे बरकरार रख पाई तो भाजपा की राह में एक बड़ी चुनौती तो खड़ी कर ही सकती है। तमाम शिकस्तों के बावजूद कांग्रेस के पास आज भी एक अखिल भारतीय स्वरूप है, जिसे पुनर्जीवित करने का मौका उसके पास फिर से आता दिख रहा है।

लेखक : वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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