सरहुल पूर्व संध्या में थिरके युवा

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रांची। मोरहाबादी स्थित रांची विवि का दीक्षांत मंडप में सरहुल पूर्व संध्या समारोह का आयोजन किया गया। सरना नवयुवक संघ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न कॉलेजों, समूहों के जनजातीय युवाओं ने लोकगीत पर लोकनृत्य की छटा बिखेरी।

लाल पाड़ की साड़ी में युवतियां और सफेद गंजी व धोती में युवा और उनकी टोलियां थिरकती नजर आयीं। संताली, मुंडारी, कुड़ुख और हो भाषाओं में सरहुल के गीतों का सिलसिला देर तक चलता रहा।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के संताली भाषा के विद्यार्थियों ने इष्ट देव से विनती की : ओका रेदो हो बाबा सारजोम बाहा, ओका रेदो हो बाबा मातकोम गेले-कहां है बाबा सरई फूल? कहां है बाबा महुआ फूल।

इस संताली गीत पर एक साथ दर्जनों युवाओं ने लयबद्ध नृत्य किया। मुंडारी भाषा के छात्रों ने साराजोम बा रेदो सुड़ा सागेन रेदो…गीत पर सामूहिक नृत्य पेश किये।

कुड़ुख भाषा के युवाओं ने बरतो बहिन बेचोत बरतो बईया बेचोत आयो बाबा ऐरा गे बराओत…,और एन्देर पूपन चाल माना नानोन रे..जैसे गीतों पर सामूहिक नृत्य की प्रस्तुति दी।

इन गीतों में सरहुल के अवसर पर फूलों के खिलने की, नृत्य के लिए आमंत्रित करने का संदेश था।
इस समारोह में 32 से ज्यादा समूहों ने जनजातीय गीतों पर नृत्य किये।

कई प्रतिभागियों ने एकल गीत से मन मोहा। ये युवा रांची विवि के विभिन्न छात्रावासों, डीएसपीएमयू, प्राक परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र छात्रावास मोरहाबादी तथा अन्य स्थानों से थे।

इन युवाओं की प्रस्तुतियों में सरहुल के स्वागत और प्रकृति के उल्लास की झलक थी।

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