सरहुल को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। सरहुल का सीधा मतलब पेड़ की पूजा करना है। सरहुल पूजा के लिए साल के फूलों, फलों और महुआ के फलों को जायराथान या सरनास्थल पर लाए जाते हैं, जहां पाहान या लाया (पुजारी) और देउरी (सहायक पुजारी) जनजातियों के सभी देवताओं की पूजा करता है।
“जायराथान” पवित्र सरना वृक्ष का एक समूह है जहां आदिवासियों को विभिन्न अवसरों में पूजा होती है। यह ग्राम देवता, जंगल, पहाड़ तथा प्रकृति की पूजा है, जिसे जनजातियों का संरक्षक माना जाता है।
नए फूल तब दिखाई देते हैं जब लोग गाते और नृत्य करते हैं। देवताओं की साल और महुआ फलों और फूलों के साथ पूजा की जाती है। आदिवासी भाषाओं में साल (सखुआ) वृक्ष को ‘सारजोम’ कहा जाता है।
सरहुल में केकड़े का महत्त्व
सरहुल में केकड़ा पकड़ने की एक खास परंपरा है। पूजा के दूसरे दिन गांव के पाहन उपवास रखते हैं और केकड़ा पकड़ने जाते हैं। इस केकड़े को अरवा धागा से बांधकर पूजा घर में टांग दिया जाता है।
जब धान की बुआई शुरू होती है तब केकड़े का चूर्ण बनाकर गोबर में मिला दिया जाता है। इसके बाद उस चूर्ण से धान की बुआई की जाती है। आदिवासियों में मान्यता है कि केकड़े का चूर्ण डालने से धान की फसल बहुत अच्छी होती है।
इस समाज के लोगों का कहना है कि केकड़े के असंख्य बच्चे होते हैं। अगर उसका चूर्ण मिलाकर धान की बुआई की जाए तो इसकी असंख्य बालियां निकलेंगी।
बारिश की भविष्यवाणी
सरहुल से एक दिन पहले सरना स्थल पर दो घड़े रखा जाता है। जिस पर सफेद धागा बांधा जाता है। फिर दूसरे दिन पूजा करते वक्त घड़े का पानी को देखा जाता है। अगर उस घड़े में पानी रहता है तो, इससे अच्छी बारिश होने के संकेत मिलते हैं।
अगर घड़े में रखा पानी सूख जाता है तो इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस वर्ष अच्छी बारिश नहीं होगी। पाहन (आदिवासी पुजारी) प्रकृति की पूजा करते हैं और मिट्टी के घड़े में पानी रखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं, जिससे किसानों को पता चलता है कि इस साल कैसी बारिश होगी।
मुर्गी की बलि
सरहुल के तीसरे दिन गांव के पाहन द्वारा रंगी हुई मुर्गी की बलि दी जाती है। चावल और बलि की मुर्गी का मांस मिलाकर खिचड़ी बनायी जाती है, जिसे सूड़ी कहते हैं। पूरे गांव में प्रसाद के रूप में इसका वितरण किया जाता है। मुर्गी की बलि देने की परंपरा सदियों पुरानी है. पाहन ईष्ट देवता से बुरी आत्मा को गांव से दूर भगाने की मनोकामना करते हैं।
सरहुल के अलग-अलग नाम
सरहुल को विभिन्न जनजातीय समुदाय में अलग–अलग नामों से भी जाना जाता है। उरांव समाज में इसे ‘खद्दी’ कहा जाता है। तो वहीं, मुंडा के लोग इसे बाह अर्थात फूलों का त्योहार कहते हैं। संथाल में इसे ‘बाहा’ कहते हैं जिसका अर्थ भी फूल होता है। खड़िया में इसे ‘जनकोर’ कहा जाता है जिसका मतलब होता है बीज का अंकुरित होना।
सरहुल पर्व से जुड़ी रीती रिवाज और परंपरा
सरहुल पूजा में पृथ्वी और सूर्य का विवाह कराया जाता है। इस दिन साल वृक्ष की भी पूजा की जाती है और अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है। सरहुल से एक दिन पहले 2 घड़ों में पानी भरा जाता है और दूसरे दिन पूजा की जाती है और देखा जाता है
कि घड़े से पानी किस तरफ से बह रहा है। ऐसा माना जाता है कि जिस दिशा से पानी बहता है, उसी दिशा से वर्षा होती है। यदि घड़े से अधिक पानी बहता है तो माना जाता है कि उस वर्ष अधिक वर्षा होगी।
इस दिन से जुड़ी कुछ अन्य मान्यताएं भी हैं, जैसे कि खिचड़ी पाहन या पुजारी द्वारा बनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि जिस दिशा से खिचड़ी उबलने लगती है, उसी दिशा से बारिश होने लगती है।
सरहुल पूजा में केकड़े को भी विशेष माना जाता है, सरहुल पूजा के दिन पाहन केकड़े को पकड़कर पूजा कक्ष में लटका देता है। जब धान की बुनाई का समय आता है तो केकड़े का पाउडर बनाकर गाय के गोबर में मिलाया जाता है। मान्यता है कि इससे फसल अच्छी होती है।
सरहुल में होती है फूलखोसी
एक समय था जब अपने साम्राज्य को लेकर दुश्मनों के साथ भीषण लड़ाई हुई थी। उस वक्त अपनों की पहचान के लिए सरई के फूल को पुरुष अपने कानों में व महिलाएं अपने जूडों में लगाकर लड़ाई के मैदान में उतरी थीं।
ताकि, अपने ही लोगों की हत्या न कर दे। उस लड़ाई में दुश्मनों की हार हुई। लड़ाई में सैकड़ों लोग मारे गए थे। इतने लोगों को दफन करना आसान नहीं था, इसलिए उन्होंने शव को साल के पेड़ की डालियों से बड़े-बड़े लकड़ियों से शव को ढक दिया था।
ताकि, शव जानवरों का शिकार न बन जाए। उसके एक वर्ष बाद उक्त स्थान पर साल की वृक्ष उग आए और हर डाली पर सरई फूल लगे थे। तब से यह मानना है कि जिनको दफन कर दिया गया था वे सरई फूल (सरजोम बा: सुडा) के रूप में बदल गए। तब से आपने पुरखों की याद व जीत की खुशी में हर वर्ष सरहूल पर्व के दिन फूलखोसी कर एक-दूसरे को बधाई दी जाती है।
इसे भी पढ़ें









