जलकुंभी से साड़ियां बनवाता है झारखंड का इंजीनियर, 450 महिलाओं को दिया रोजगार

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जमशेदपुर : अभिशाप को वरदान में कैसे बदला जाता है झारखंड के गौरव आनंद यह बखूबी जानते हैं। तभी तो उन्होंने जलकुंभी से फाइबर बनाने की तकनीक विकसित की और कपास के मिश्रण से उससे साड़ियां बनवाने लगे। उनकी इस कवायद से पर्यावरण की रक्षा तो हुई ही 450 महिलाओं को रोजगार भी मिल गया है। 16 साल के अपने जमे-जमाये कॉरपोरेट करियर को छोड़कर जलकुंभी से निकाले गये फाइबर से हैंडलूम फ्यूजन साड़ियां बनवानेवाले गौरव कहते हैं कि जलस्रोतों में बढ़ती जलकुंभी एक बड़ी समस्या है और मैं इसका स्थायी समाधान खोजना चाहता था।

इसलिए जलकुंभी से साड़ी बनाने की सोची। एक साड़ी बनाने के लिए लगभग 25 किलो जलकुंभी का उपयोग किया जाता है। गौरव कहते हैं कि मैंने फरवरी 2022  में पहली बार ऐसी साड़ी बनाई थी, उसके बाद से 50 फ्यूजन साड़ियां बना चुके हैं।

उनका साल के अंत तक 1,000 और ऐसी  साड़ियां बनाने का लक्ष्य है। पेशे से पर्यावरण इंजीनियर  रहे गौरव ने टाटा स्टील के साथ काम करते हुए नदी सफाई अभियान के दौरान जलकुंभी के रूप में नदी में इस बड़ी समस्या की  पहचान की थी। गौरव कहते हैं कि जलकुंभी गंगा, गोदावरी और कृष्णा जैसी बहने वाली नदियों को छोड़कर लगभग सभी नदियों में मौजूद है। यह एक बड़ी समस्या है जिसका पर्यावरण अनुकूल समाधान जरूरी है।

ऐसे बनती हैं साड़ियां

गौरव ने बताया कि जलकुंभी से साड़ियां बनाने के लिए जलकुंभी की लुगदी से फाइबर बनाया जाता है। गूदे से कीड़ों को दूर करने के लिए उसे गर्म पानी से उपचारित करने के बाद तने से रेशे निकाले जाते हैं। इन रेशों से धागा बनता है और इनपर रंग लगाया जाता है। इन्हीं धागों से बुनकर साड़ियां बनाते हैं। जलकुंभी से एक साड़ी बनाने में तीन से चार दिन का समय लगता है। गौरव कहते हैं ये अपनी तरह का पहला उत्पाद है जो जलकुंभी से बनता है।

जलकुंभी से साड़ियां बनाने का कांसेप्ट यूनिक तो है साथ ही हमने इसका भी ख्याल रखा कि यह लोगों की पहुंच के भीतर हो। साड़ी बनाने के लिए जलकुंभी और कपास का अनुपात  25:75  रखा जाता है। उन्होंने बताया कि  फाइबर जितना महीन होगा, उसकी कीमत उतनी ही अधिक होगी। साड़ी की कीमत हमने 2,000-3,500 रुपये के बीच रखी है ताकि यह मध्यम आय वर्ग के पहुंच के भीतर हो। 

ग्रामीण महिलाओं को मिला रोजगार

गौरव बताते हैं कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के शांतिपुर गांव के करीब 10 बुनकर परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उन्हें रोजगार दिया है। शांतिपुर गांव में, लगभग हर घर में हथकरघा का उपयोग करके साड़ियां बनाई जाती हैं। लेकिन अधिकांश बुनकर परिवार वैकल्पिक नौकरियों में बदल रहे थे क्योंकि वे पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम नहीं थे। चार दिनों की कड़ी मेहनत के लिए उन्हें 500 रुपये से अधिक नहीं मिलते थे। 

जीने का मकसद पूरा

हमारा उद्देश्य साड़ी बनाकर कमाई करना नहीं है। हम सिर्फ बुनकरों की आजीविका को बढ़ावा देना चाहते हैं, ताकि वे काम न छोड़ें और प्रेरित रहें। बुनकरों के अलावा, गौरव 450 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने में सक्षम रहे हैं, जिन्हें बुनकरों को भेजने से पहले जलाशयों से जलकुंभी इकट्ठा करने और उन्हें संसाधित करने के लिए लगाया गया है। गौरव कहते हैं कि इस पहल ने उन्हें एक उद्देश्य के साथ जीने में मदद की है।

“अगर मैं कॉर्पोरेट नौकरी करते हुए सेवानिवृत्त होता, तो मैंने अपने देश के लिए कुछ नहीं किया होता। पहले जब मुझे वेतन मिलता था तो मैं केवल अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता था। आज मैं इस काम से इतने परिवारों का भरण-पोषण कर पा रहा हूं। यह मेरे लिए खुशी का पल है। मेरा इरादा 450 महिलाओं की संख्या बढ़ाकर लाखों करने का है।

स्वच्छता पुकारे फाउंडेशन की स्थापना की है

गौरव ने अपना कॉरपोरेट करियर छोड़कर स्वच्छता पुकारे फाउंडेशन की स्थापना की है। इसका आइडिया कैसे आया इस बाबत उन्होंने कहा कि वे पिछले चार सालों से अधिक समय से नदियों और जलस्रोतों की सफाई कर रहे हैं। इस दौरान मैनें पाया कि अधिकांश समय वे जलकुंभी से भरे रहते हैं। जलकुंभी को समस्या से संसाधन के रूप में कैसे विकसित किया जाये यह सोचते हुए हमने इससे साड़ी बनाने की सोची।

इसके बाद हमने इससे लैंपशेड, नोटबुक और शोपीस तैयार किए। रिसर्च के दौरान हमने पाया कि जलकुंभी में सेलूलोज होता है। यह फाइबर की बुनियादी जरूरत है। इसकी खासियत जानने के बाद हमने ऐसे लोगों से संपर्क किया जो इससे तैयार सामग्री से बुनाई कर सके और इस प्रकार शुरूआत हो गयी। वहीं फाउंडेशन के मैनेजर कौशिक मंडल ने बताया कि चूंकि धागा मैन्युअल रूप से बनाना कठिन काम है इसलिए हमने हैदराबाद और तमिलनाडु के इरोड में कुछ छोटे उद्योगों से संपर्क किया है।

वहां तकनीक से धागा तैयार किया जा रहा है। अगर 100 फीसदी जलकुंभी से साड़ियां बनायी जायें तो यह कमजोर होगी इसलिए इसमें कपास, पॉलिएस्टर, तसर और अन्य फाइबर जैसी सामग्री का उपयोग किया जा रहा है।

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