चम्पाई सोरेन का अब क्या होगा? [What will happen to Champai Soren now?]

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रांची। झारखंड में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। अटकलों का बाजार गर्म है। इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जेल से बाहर निकलने के बाद झारखंड में सियासी हलचल तेज हो गयी है।

आज बुधवार को सत्ता पक्ष के विधायकों की बैठक चल रही है। विधायक दल की बैठक बुलाये जाने के साथ ही घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं।

मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने मंगलवार को सभी सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिये।

मुख्यमंत्री को मंगलवार को दुमका में योजनाओं के उदघाटन-शिलान्यास व परिसंपत्ति के वितरण कार्यक्रम में जाना था।

बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उन्होंने अपना दुमका दौरा रद्द कर दिया। मंत्री बसंत सोरेन और दुमका के सांसद नलिन सोरेन कार्यक्रम में शामिल हुए।

रांची के होटवार में प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम में भी मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को जाना था, लेकिन वह नहीं गये। इतना ही नहीं. 3 जुलाई को पीजीटी नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम भी रद्द कर दिया गया।

हेमंत या कल्पना चर्चा तेज

ये सभी घटनाक्रम बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं। चर्चा है कि सत्ता पक्ष के विधायकों की बैठक में नेतृत्व परिवर्तन पर चर्चा हो सकती है।

या तो हेमंत सोरेन कमान संभालेंगे या फिर कल्पना। यही चर्चा पूरे सियासी गलियारे में चल रही है।

क्या कहना है झामुमो नेताओं का

वहीं, मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के कार्यक्रम रद्द होने के मामले में अधिकारी कुछ भी बोलने से बचते रहे, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव विनोद पांडेय ने कहा कि बारिश की वजह से वह कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए।

ऐसी वैसी कोई बात नहीं है। आगे होनेवाले कार्यक्रमों में वह शामिल होंगे। अब विनोद पांडेय कुछ भी कहें, यह तो जग जाहिर है कि मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के सारे सार्वजनिक और निजी कार्यक्रम स्थगित किये जा चुके हैं।

क्या असहज हैं चंपाई

दरअसल, जबसे हेमंत सोरेन जेल से बाहर आये है, तब से ऐसी ही अटकलें लगाई जा रही हैं कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है।

हेमंत सोरेन की अनुपस्थिति में चंपाई सोरेन को केयर टेकर मुख्यमंत्री बनाया गया है..आदि..आदि।

मतलब जितने लोग, उतनी बातें। मगर चंपाई सोरेन क्या चाहते हैं या क्या बोल रहे हैं, यह सुनाई नहीं पड़ रहा।

क्या इस फैसले से वह खुश होंगे। क्योंकि जब वह मुख्यमंत्री बने थे, तब तो केयरटेकर वाली कोई बात ही नहीं थी।

सरकार भी उन्होंने अच्छे से चलाई। सोरेन परिवार और संगठन को साथ लेकर चले। हेमंत सोरेन की योजनाओं को आगे बढ़ाते रहे, न सिर्फ आगे बढ़ाते रहे, बल्कि उसमें वैल्यू एड भी किया।

संगठन के एजेंडों को आगे बढ़ाया। समय रहते चुनावी तैयारियां शुरू कर दी, कि उनके कामकाज से ही पता चल गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सरकार चुनावी मोड में आ गई है।

कई लोक लुभावने घोषणाएं भी उन्होंने की मसलन 200 यूनिट बिजली फ्री, अबुआ स्वास्थ्य योजना, मां-बहन-बेटी स्वावलंबन योजना आदि।

इन सबके बावजूद एकाएक जब उनकी कुर्सी खिसकने की बात होने लगी, तो जाहिर वह भी हिल गये होंगे।

भले ही वह कुछ न कह रहे हों, लेकिन एक दिन में दो बार हेमंत सोरेन का उनके यहां पहुंचना ही बताता है कि सबकुछ ठीक नहीं है।

चंपाई सोरेन इस तरह के फैसले या चर्चा से असहज हैं। यह भी सही है कि चंपाई सोरेन गुरुजी और झामुमो के प्रति वफादार हैं।

परंतु उनकी भी गरिमा है। इसे ठेस लगने से वह कैसे बचा सकेंगे। केयर टेकर के लेबल चिपकना किसी को भी शायद ही अच्छा लगे।

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