रांची। अब पिक्चर क्लीयर है कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन[Kalpana Soren] खाली हुई गांडेय सीट से उपचुनाव में उतरेंगी। कल्पना सोरेन का यह चुनावी राजनीति में पहला कदम होगा।
कल्पना सोरेन चुनाव मैदान में उतर रही हैं, इससे कार्यकर्ताओं और हेमंत सोरेन के समर्थकों में उत्साह है। साथ ही, यह देखना भी जरूरी है कि झामुमो की उन्हें जिताने की तैयारी कितनी है।
यह देखना इसलिए जरूरी है कि चुनावी जटिलताओं के समीकरण के लिए सिर्फ यही पर्याप्त नहीं है कि यहां से पिछली बार झामुमो विधायक सरफराज अहमद यहां से विजयी रहे हैं।
जिस समय सरफराज अहमद जीते और वर्तमान समय में जो राजनीतिक स्थिति है, उसका भी ध्यान रखना होगा। झामुमो का लोकसभा चुनाव में उतरने से पहले उलगुलान महारैली करना एक बड़ा कदम है।
इससे झामुमो के साथ गठबंधन की पार्टियों के पक्ष में माहौल बनेगा। इसका फायदा हो सकता है गांडेय चुनाव में कल्पना सोरेन को भी मिले।
गांडेय के चुनावी माहौल और समीकरण की समीक्षा करने से पहले 2019 में जब विधानसभा चुनाव हुआ था, तब राजनीतिक दलों की स्थिति क्या थी, इसकी विवेचना भी जरूरी है।
2019 के विधानसभा चुनाव में गांडेय क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति कुछ इस प्रकार थी-
- डॉ सरफराज अहमद (झामुमो) 65,023
- जय प्रकाश वर्मा (भाजपा) 56,168
- अर्जुन बैठा (आजसू) 15,361
- सुनील कुमार यादव (निर्दलीय) 9,900
- कर्मिला टुडू (निर्दलीय ) 9,056
- दिलीप कुमार वर्मा (जेवीएम-पी) 8,952
- राजेश कुमार (सीपीआई(एमएल) 7,408
- इन्तेखाब अंसारी (एआईएमआईएम ) 6,039
- नोटा 3,734
- ललिता रे (निर्दलीय) 2,076
- अरुण प्रसाद वर्मा (निर्दलीय) 1,625
यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि उस चुनाव में भाजपा और आजसू अलग-अलग लड़े थे। अगर भाजपा और आजसू के ही मिले वोटों को जोड़ लिया जाये तो उस समय दोनों के साथ लड़ने की स्थिति में गांडेय सीट एनडीए के पास होती।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वर्तमान में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम (पी) भी चुनाव लड़ी थी और उसने 9,056 वोट भी लाये थे।
यह वोट भी पिछले वोट में बड़ा अंतर पैदा कर देता। तीन पार्टियों के संयुक्त वोटर्स भी उपचुनाव में अंतर पैदा कर सकते हैं।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह उपचुनाव लोकसभा चुनाव के साथ हो रहा है। गिरिडीह लोकसभा चुनाव में जिस भी पार्टी का वर्चस्व होगा, उसका सीधा असर भी गांडेय उपचुनाव पर पड़ेगा।
झामुमो कल्पना सोरेन को चुनावी मैदान में उतार रहा है, तो उसका एक मकसद सिंपैथी वोट कवर करना भी है। इसके लिए पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मुद्दे को उठाना चाहेगी।
उनके साथ जो भी हुआ उसे ‘नाइंसाफी’ और चुनी हुई सरकार को कुचलने का प्रयास बताते हुए लोगों के बीच जाने की कोशिश होगी।
वैसे भी झामुमो हेमंत का चेहरा सामने रखकर ही चुनावी मैदान में उतरेगा। ‘आदिवासियों के साथ हो रही नाइंसाफी’ का मुद्दा लेकर जनता के बीच जायेगा।
इसके अलावा झामुमो कुछ समय से यह प्रचारित कर रही है कि पिछली सरकारों ने राज्य के लिए कुछ भी काम नहीं किया और झामुमो ने पिछले साढ़े चार साल में जो काम किया है, जो योजनाएं जनता के लिए लायी हैं, उन उपलब्धियों को लेकर भी वह जनता के बीच जायेगी।
अब यह देखना है कि सरकार के इन प्रयासों का उसे कितना लाभ मिलता है। फिर गठबंधन के दलों के साथ चुनाव लड़ने का भी उसे फायदा मिल सकता है, जो कि पिछली बार भी साथ ही थे।
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