Jharkhand High Court: रॉयल्टी नहीं दी तो नहीं चलेगा कारोबार, झारखंड हाईकोर्ट ने खनन कंपनियों को दी चेतवानी

Anjali Kumari
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Jharkhand High Court

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने पत्थर खनन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सख्त रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता आनंद कुमार सिंह को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि खनन रॉयल्टी का भुगतान तय समय पर नहीं किया गया है, तो प्रशासन द्वारा खनन पट्टा समय से पहले रद्द किया जाना पूरी तरह वैध और नियमों के अनुरूप है।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को क्या कहा गया?

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जिला खनन पदाधिकारी ने याचिकाकर्ता को बकाया रॉयल्टी जमा करने के लिए 30 दिनों का नोटिस जारी किया था। इसके बावजूद निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं की गई। इसके बाद पलामू के उपायुक्त ने खनन पट्टा समाप्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी आधिकारिक सूचना 8 फरवरी 2020 को दी गई थी।

यह मामला पलामू जिले के चपरवार मौजा स्थित पत्थर खनन पट्टे से संबंधित है। याचिकाकर्ता को यह पट्टा वर्ष 2014 में 10 वर्षों की अवधि के लिए आवंटित किया गया था। उनके पास पर्यावरण स्वीकृति और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति भी थी, लेकिन इसके बावजूद वर्ष 2016 से 2019 के बीच खनन रॉयल्टी की राशि जमा नहीं की गई।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उपायुक्त द्वारा कोई विधिवत आदेश पारित नहीं किया गया और बिना पर्याप्त सुनवाई का अवसर दिए पट्टा रद्द कर दिया गया। हालांकि, राज्य सरकार ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि रॉयल्टी बकाया होना निर्विवाद तथ्य है और खनन नियमों के तहत उपायुक्त को पट्टा रद्द करने का पूरा अधिकार है।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि जब रॉयल्टी भुगतान नहीं किया गया हो, तो मामले को दोबारा उपायुक्त के पास भेजना महज औपचारिकता होगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला देकर राहत नहीं दी जा सकती। साथ ही अदालत ने खान आयुक्त द्वारा पुनरीक्षण याचिका खारिज किए जाने के फैसले को भी सही ठहराया।

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