ऐतिहासिक दो दिनी मुड़मा मेला शुरू

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जानिये, क्या है मुड़मा मेले का इतिहास

रांची। झारखंड का ऐतिहासिक मुड़मा मेला सोमवार से शुरू हो गया है। मंगलवार को इसका समापन होगा। रांची से 35 किलोमीटर दूर स्थित मांडर में इस मेला का आयोजन केंद्रीय राजी पहड़ा समिति के द्वारा किया जाता है। इसे आदिवासी सामाज का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। इसका आयोजन दशहरे के दसवें दिन किया जाता है।

मुड़मा मेला का धार्मिक महत्व

मुड़मा मेला में पहड़ा के पाहनों द्वारा पूरा विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती हैं। पाहन पारंपरिक रूप से सरगुजा के फूल सहित अन्य पूजन सामग्री से देवी-देवताओं का आहवाहन करते हुए जतरा खूँटा का पूजन करते हैं। मेले में मौजूद श्रद्धालु सिर पर जौ और गेंदे का फूल भरा कलश लेकर माँ शक्ति की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद हाथ में जल लेकर शक्ति खूंटा की पूजा करते हैं। ढ़ोल, नगाड़ा और मांदर को बजाते हुए नृत्य भी करते हैं। फिर मेला घुमते हैं। सरना धर्मगुरु के अनुसार यह आदिवासियों का शक्तिपीठ है। मुड़मा गांव, मुंडा और उरांव आदिवासी समुदायों का मिलन स्थल भी है। इस मेले में सभी समुदाय के लोग आते हैं।

आदिवासी समुदाय के लोग इस दिन मां शक्ति की पूजा-आराधना के लिए एक जगह एकत्रित होते हैं। ये सभी आदिवासी पहड़ा के अंतर्गत आते हैं और हर पहड़ा में कई गांव शामिल होते हैं। पहड़ा, मुड़मा में रहने वाले आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्था को कहा जाता है।

 ये है ऐतिहासिक महत्व

माना जाता है कि यह मेला 14वीं सदी से होता आ रहा है। मुड़मा पर्व जीत की जश्न के तौर पर मनाया जाता है। मान्यता है कि मुंडा जनजाति के लोग मुड़मा के मूल निवासी थे। छोटानागपुर के इतिहास के अनुसार, जब मुगलों ने रोहतसगढ़ पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया, तो वहां के उरांव समुदाय के लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा। वो सोन नदी को पार कर पलामू होते हुए रांची जिला में आये। यहां मुड़मा में इनका सामना मुंडा जनजाति के मुड़ओं से हुआ।

उरांव लोगों की व्यथा सुनकर मुड़ओं ने उनके साथ मुंडा जनजाति समुदाय का सांस्कृतिक समझौता इसी स्थल पर किया था। हालांकि बाद में इनके बीच क्षेत्र को लेकर विवाद हुआ और झगड़े भी हुए। कई वर्षों के बाद उनके बीच क्षेत्र का विभाजन भी यहीं हुआ था। यह निर्णय लिया गया कि दोनों दोनों के बाच एक संगीत और नृत्य प्रतियोगिता होगी। इसके बाद विवाद का निपटारा हो सका। तब से ही इस सांस्कृतिक समझौते की याद में मुड़मा मेला का आयोजन किया जाता है।

प्रकृति के करीब है यह मेला

इस मेले में गौर किया जाये, तो यह प्रकृति के काफी करीब नजर आता है। मेले में मिलनेवाले ज्यादातर सामान वन उपज से संबंधित होते हैं। यहां आनेवाले लोग अपने पारंपारिक वेश-भूषा में ही नजर आते हैं। इस मेले में कई प्रकार के कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। खासकर आदिवासियों के द्वारा हर दिन उपयोग करने वाले बांस के औजार, बांस के खिलौनें, पत्थर के प्याले, साल के पत्ता और बांस से बना बिना हैंडल वाला छाता मिल जाएगा। यही एक मेला है, जहां आज भी कठपुतली का नाच देखने को मिल जाता है। मेला पूरी रात गुलजार रहता है। हर ओर नृत्य, संगीत और उल्लास का माहौल देखने को मिलता है।

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