भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण है महिलाओं का योगदान

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2025 तक भारत के जीडीपी में होगी 46 लाख करोड़ की हिस्सेदारी

रांची। हमारा घर संभालनेवाली आम गृहणियां भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। पर आप जानकर हैरान हो जायेंगे कि घरों में रहकर खाना पकाने से लेकर बच्चों की देखभाल करने वाली गृहणियों का प्रतिवर्ष लगभग 23 लाख करोड़ का योगदान जीडीपी में होता है। यह देश की कुल जीडीपी का 7.5 प्रतिशत है। खास बात यह है कि इसमें ग्रामीण महिलाओं का योगदान ज्यादा है। भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च टीम ने यह रिपोर्ट जारी किया है।

इसे एसबीआइ इकोरैप के नाम से जाना जाता है, जो सरकार की राष्ट्रीय सेवा योजना के साथ मिलकर आर्थिक सर्वे रिपर्ट तैयार करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं का बिना वेतन किया जाने वाला घरेलू काम जीडीपी का 7.5 है। महिलाओं के घरेलू कामकाज को पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों से बाहर रखा जाता है। उनका योगदान भी आर्थिक उत्पादन के दायरे से बाहर रहता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रम बाजार में महिलाओं की दशा को समझने के लिए उनके अवैतनिक कार्य को समझना आवश्यक है। विश्लेषण के लिए जनवरी से दिसंबर 2019 के एक सर्वे रिपोर्ट के डाटा का उपयोग किया गया।

पुरूषों से ज्यादा काम करती हैं महिलाएं

इससे पहले आइआइएम अहमदाबाद के शोध में भी कहा गया था कि अवैतनिक घरेलू काम पर पुरुषों के मुकाबले महिलाएं रोज ढाई गुना ज्यादा समय देती हैं।

शोध के मुताबिक 15 से 60 साल की महिलाएं रोज 7.15 घंटे अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं, वहीं पुरुष सिर्फ पौने तीन घंटे समय देते हैं।

बिना वेतन काम करती हैं 36.3 करोड़ महिलाएं

रिपोर्ट में शहरी इलाके में 18-60 वर्ष की महिलाओं की संख्या 13.2 करोड़ तो ग्रामीण इलाके में 28.7 करोड़ बताई गई है।

शहरी इलाके में 13.2 करोड़ में से चार करोड़ महिलाएं वेतन लेकर काम करती है। वहीं, ग्रामीण इलाके की 28.7 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ 1.4 करोड़ महिलाएं वेतनभोगी है।

इस प्रकार अवैतनिक रूप से काम करने वाली महिलाओं की संख्या ग्रामीण इलाके में 27.3 करोड़ तो शहरी इलाके में 9.3 करोड़ है।

प्रतिमाह 8 हजार का काम करती हैं महिलाएं

शोधकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं को रोज 8 घंटे काम के हिसाब से यदि वेतन दिया जाता तो ग्रामीण महिलाओं की हर महीने 5 हजार रुपए और शहरी महिलाओं की 8 हजार रुपए की आय होती।

भारत के जीडीपी में 14.7 लाख करोड़ शहरी इलाके की घरेलू महिलाएं और आठ लाख करोड़ रुपये का योगदान दे रही हैं। एसबीआइ की रिपोर्ट के मुताबिक छह साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं का घरेलू कामकाज का औसत समय 7.2 घंटे है।

..तो भारत को 188 लाख करोड़ अतिरक्त का फायदा होगा

एसबीआइ ग्रुप के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष का कहना है कि महिलाओं के साथ भेदभाव खत्म करने से देश की इकोनॉमी तेजी से बढ़ेगी।

इससे 2025 तक जीडीपी में 46 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। विकास दर भी 1.4% फीसदी ज्यादा संभव है।

इतना ही नहीं, कंसल्टेंसी फर्म मैकिंजे की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर कामकाजी महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव पूरी तरह खत्म हो जाए, तो 2025 तक भारत की जीडीपी को 188 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त फायदा होगा।

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