राजनीति में भोलेपन और भावुकता का दांव

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एक ही दिन दो पासे फेंके गये

रांची। भारतीय राजनीति के दो नये रंग बीते 26 फरवरी को देखने को मिले। इससे यह पता चला कि राजनीत में सिर्फ दबंगई और चालाकरी के दांव ही नहीं चले जाते, बल्कि भोलापन और भावुकता के पासे भी फेंके जाते हैं।

राहुल का भोला पंच

बीते रविवार को पहले तो राहुल गांधी ने छत्तीगढ़ में अपना भोलापन दिखाया। इसके बाद इसी दिन शाम को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नया रूप दिखाया। जेल जाने पहले उन्होने भावुकता का कार्ड खेला।

पहले हम राहुल गांधी की बात करते हैं। रायपुर में कांग्रेस के अधिवेशन में राहुल ने अपने भाषण में भोलापन दिखाया।

कहा कि 1977 में जब उनका सरकारी मकान ख़ाली हो रहा था, तब बहुत छोटे थे। घर का सामान पैक हो रहा था।

उन्होंने मां से पूछा- हम कहां जा रहे हैं? माँ ने कहा- ये सरकारी मकान है, अब हमें इसे छोड़ना है। मैंने पूछा- कहां जायेंगे? माँ ने कहा- पता नहीं। आज बावन साल हो गए पर उनके पास आज भी घर नहीं है।  

राहुल ने अपनी यात्रा के क़िस्से में भावना छलकायी। कहा कि लेकिन चलते-चलते मेरा घमंड चूर हो गया। मैं लोगों के गले मिलता और अपने आप हालात पता चल जाते थे।

इससे यह तो स्पष्ट है कि राहुल अपने भोलेपन से भावुकता की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। यह यह देखना होगा कि उनके इस भोलेपन से लोग कितने प्रभावित होते हैं।

भावना का ओवरडोज दिया सिसोदिया ने

उधर, दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया रविवार की शाम गिरफ्तार हुए। मामला शराब नीति का है। आरोप है कि मनीष सिसोदिया ने ऐसी शराब नीति गढ़ी जिससे सरकार की बजाय शराब व्यापारियों का फ़ायदा हुआ।

इसके बाद मनीष सिसोदिया ने भी भावुकता का कार्ड खेला। वे पहले अपनी मां से मिलने गये। फिर जुलूस के सीबीआई दफ़्तर तक पहुंचे।

लोगों से कहा कि मैं जेल जा रहा हूं। घर में मेरी पत्नी अकेली हैं। वह बीमार रहती हैं। आप लोग ख़्याल रखना।  

अब सिसोदिया की इस भावुकता का सीबीआइ या लोगों पर क्या असर पड़ेगा, पता नहीं। ये भारतीय राजनीति का नया चेहरा है।

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