Rahul and Tejashwi Yadav: बिहार में अति पिछड़ा वर्ग को साधने की रणनीति, राहुल-तेजस्वी ने की 10 वादों की घोषणा

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Rahul and Tejashwi Yadav:

पटना, एजेंसियां। बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने वोटरों को साधने के लिए अपनी चालें चलना शुरू कर दी हैं। बुधवार को महागठबंधन ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को साधने के लिए 10 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा कर दी। इस संकल्प पत्र को “अति पिछड़ा न्याय संकल्प” नाम दिया गया है, जिसमें शिक्षा, रोजगार और आरक्षण पर बड़े वादे किए गए हैं। माना जा रहा है कि महागठबंधन ने यह कदम नीतीश कुमार के पारंपरिक वोट बैंक को खींचने के इरादे से उठाया है।

महागठबंधन का 10 सूत्री “अति पिछड़ा न्याय संकल्प”

• महागठबंधन ने अपने संकल्प पत्र में कई बड़े वादे किए हैं। इसमें सबसे अहम है –

• ‘अतिपिछड़ा अत्याचार निवारण अधिनियम’ का पारित होना।

• पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण 20% से बढ़ाकर 30% करना।

• आरक्षण की 50% सीमा को बढ़ाने के लिए कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करना।

• भर्ती प्रक्रिया में “Not Found Suitable (NFS)” अवधारणा को अवैध घोषित करना।

• भूमिहीन अतिपिछड़ा, दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग को शहरी क्षेत्रों में 3 और ग्रामीण क्षेत्रों में 5 डेसिमल आवासीय भूमि देना।

• शिक्षा अधिकार अधिनियम 2010 के तहत निजी विद्यालयों में आरक्षित सीटों का आधा हिस्सा EBC, OBC, SC और ST वर्ग के बच्चों के लिए सुनिश्चित करना।

• 25 करोड़ तक के सरकारी ठेकों और सप्लाई कार्यों में 50% आरक्षण।

• निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करना।

• आरक्षण नियामक प्राधिकरण का गठन।

• आरक्षण सूची में किसी भी बदलाव के लिए विधानसभा की अनुमति अनिवार्य।

कर्पूरी ठाकुर मॉडल की झलक

महागठबंधन ने इस घोषणा पत्र को कर्पूरी ठाकुर की नीतियों से प्रेरित बताया है। 1977-79 में मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर ने पहली बार पिछड़ों और गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। उस समय अति पिछड़ों को 26% आरक्षण और गरीब सवर्णों को 3% आरक्षण दिया गया था। अब महागठबंधन उसी सामाजिक न्याय एजेंडे को दोहराकर चुनावी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

नीतीश और EBC वोटर्स

बिहार में 36% आबादी के साथ EBC सबसे बड़ा वोट बैंक है। यह वर्ग परंपरागत रूप से नीतीश कुमार का समर्थक रहा है। नीतीश ने 2005 में सत्ता में आने के बाद पंचायती राज संस्थाओं में 20% और बाद में नगरीय निकायों में भी आरक्षण लागू किया। यही वजह है कि अति पिछड़ा वर्ग ने उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखा। लेकिन अब महागठबंधन की रणनीति सीधे तौर पर नीतीश के इस वोट बैंक पर चोट करती दिख रही है।

बिहार में कितनी हैं EBC जातियां?

2023 में हुए जातीय सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की आबादी 36% है और इसमें कुल 112 जातियां शामिल हैं।

• इनमें से केवल 4 जातियां – तेली, मलाह, कानू और धनुक – की आबादी 2% से ज्यादा है।

• मुस्लिम जातियों में जुलाहा सबसे अहम है, जिसकी आबादी लगभग 3.5% है।

• शेष 100 जातियों की आबादी 1% से भी कम है।

सियासी असर

महागठबंधन का यह कदम चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। अगर कांग्रेस-राजद का यह दांव सफल होता है, तो एनडीए को खासकर नीतीश कुमार को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल, एनडीए को इस घोषणा पत्र की काट ढूंढनी होगी।साफ है कि बिहार चुनाव से पहले अति पिछड़ा वर्ग एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए सबसे अहम कार्ड बन गया है।

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