Prashant Kishore Babu statement:
पटना, एजेंसियां। बिहार चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर और उनकी जनसुराज पार्टी के खराब प्रदर्शन ने एक बार फिर यह राजनीतिक सच उजागर कर दिया कि सिर्फ पदयात्रा, नारे या रणनीति से चुनाव नहीं जीते जाते। भारतीय राजनीति के इतिहास में जिन नेताओं ने बड़ी सफलता हासिल की, उन्होंने हमेशा किसी न किसी मजबूत राजनीतिक ढांचे सत्ता, संगठन या जनांदोलन का सहारा लिया। प्रशांत किशोर की विफलता की जड़ यही है कि उन्होंने इन बुनियादी वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया।
आजादी के बाद के चुनावों का हाल:
आजादी के बाद के चुनावों में पंडित जवाहर लाल नेहरू की विराट लोकप्रियता केवल उनके व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि कांग्रेस के शक्तिशाली संगठन और आजादी के आंदोलन की विरासत से निर्मित हुई थी। इंदिरा गांधी भी सत्ता में रहते हुए ही साहसिक फैसले ले सकीं बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स खत्म करने जैसे कदम उनकी छवि को मजबूत बनाने में निर्णायक साबित हुए। यानी सत्ता ने छवि को आकार दिया, और छवि ने चुनाव को।1977 में जनता पार्टी की जीत भी उसी समय संभव हुई जब इमरजेंसी विरोधी माहौल, जयप्रकाश नारायण का जनांदोलन और कई दलों के संगठनात्मक आधार एक साथ आए। बाद में वीपी सिंह की सफलता में ‘बोफोर्स’ मुद्दे के साथ भाजपा और वामदलों का समर्थन जरूरी साबित हुआ।
अरविंद केजरीवाल की सफलता भी अन्ना आंदोलन भी देन है:
राज्यों में ममता बनर्जी, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, करुणानिधि, नवीन पटनायक, देवेगौड़ा और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता भी किसी न किसी पुरानी पार्टी, आंदोलन या सत्ता की छांव में खड़े होकर बड़े बने। अरविंद केजरीवाल की सफलता भी अन्ना आंदोलन और उसके बाद दिल्ली की सत्ता में मिले अवसरों की देन थी।इसके मुकाबले प्रशांत किशोर ने बिना किसी स्थापित संगठन, सत्ता अनुभव या जनांदोलन के सहारे केवल पदयात्रा के दम पर चुनावी सफलता की उम्मीद रखी। परिणामस्वरूप, आंदोलन की गर्मी, संगठन की पकड़ और सत्ता के अनुभव तीनों के अभाव ने जनसुराज को जमीन नहीं पकड़ने दी।
