Bihar government:
पटना, एजेंसियां। बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी माहौल गर्म है। इस बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 2023-24 की वित्तीय रिपोर्ट ने नीतीश कुमार सरकार को घेरे में लिया है। रिपोर्ट में राज्य सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वह 70,877 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्र (UC) नहीं जमा कर पाई। यह स्थिति राज्य के प्रशासनिक कामकाज की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिससे गबन और धन के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया है।
स्मार्ट सिटी योजना और विभागों की लापरवाही
रिपोर्ट में पंचायती राज, शिक्षा और शहरी विकास जैसे मंत्रालयों का जिक्र किया गया है, जिनमें सबसे अधिक प्रमाणपत्र जमा नहीं किए गए हैं। पंचायती राज मंत्रालय ने 28,154.10 करोड़ रुपये, शिक्षा मंत्रालय ने 12,623.67 करोड़ रुपये और शहरी विकास मंत्रालय ने 11,065.50 करोड़ रुपये के प्रमाणपत्र जमा नहीं किए। इन विभागों पर सीधा आरोप है कि उन्होंने सरकार को विश्वास में नहीं लिया और आवश्यक वित्तीय दस्तावेजों को समय पर प्रस्तुत नहीं किया।
तेजस्वी यादव के कार्यकाल का कनेक्शन
दिलचस्प बात यह है कि ये आंकड़े तेजस्वी यादव के कार्यकाल से भी जुड़ते हैं, जब वह उपमुख्यमंत्री थे। 2015 में गठबंधन सरकार बनने के बाद, कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी जेडीयू और आरजेडी नेताओं को सौंपी गई थी, और तब भी इन विभागों ने उपयोगिता प्रमाणपत्रों को लेकर लापरवाही बरती।
वर्तमान सरकार पर बढ़ा दबाव
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार सरकार ने पिछले वित्तीय वर्ष में 2.60 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन शेष 65,512.05 करोड़ रुपये में से केवल 23,875.55 करोड़ रुपये ही वापस किए गए। सरकार के इस वित्तीय मिसमैनेजमेंट ने विपक्षी पार्टियों को हमला करने का मौका दे दिया है और आगामी विधानसभा चुनाव में इसका असर पड़ सकता है।
राजनीतिक उथल-पुथल का आलम
कैग की रिपोर्ट ने सत्ताधारी गठबंधन को घेरते हुए सवाल खड़े किए हैं कि कैसे इतने बड़े पैमाने पर वित्तीय अनुशासन की कमी रही और यह बिहार की विकास योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधते हुए इस मुद्दे को आगामी चुनाव में भुनाने की योजना बनाई है।
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