50 years of emergency:
रांची। आजाद भारत के इतिहास में 25 जून को एक ऐसी घटना की 50 साल पूरे हो रहे हैं जिसमें 21 महीनों तक सत्ता का अतिरेक देखने को मिला था। उस अवधि में नागरिकों की संविधान प्रदत्त स्वतंत्रताओं को खत्म कर दिया गया था और विभिन्न संस्थानों की नियंत्रण एवं संतुलन व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई थी। आपातकाल पर राष्ट्रपति, कैबिनेट और संसद ने मुहर लगाई थी। यह आपातकाल बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति के खतरे के नाम पर लगाया गया था।
50 years of emergency: इंदिरा गांधी के निजी संकट के कारण लगा आपातकालः
इंदिरा गांधी द्वारा देश पर आपातकाल थोपने के कई कारण बताये जाते हैं। जैसे कि जेपी का आंदोलन, कांग्रेस के अंदर के द्वंद्, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी को मिली चुनौती और आर्थिक कारण। लेकिन, आपातकाल लगाये जाने का एक ही कारण था, वह था इंदिरा गांधी का निजी संकट। अगर इंदिरा गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल जाती, तो आपातकाल नहीं लगाया जाता। कुछ इतिहासकार गलत कहते हैं कि आपातकाल के लिए जितनी जिम्मेदार इंदिरा गांधी थीं, उतने ही जिम्मेदार जेपी थे।
आपातकाल के लिए सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी जिम्मेदार थीं। सिद्धार्थ शंकर रे तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे, लेकिन जब-तब उन्हें विचार-विमर्श के लिए दिल्ली बुला लिया जाता था। रे 20 जून, 1975 से ही दिल्ली में थे। उन्होंने ही इंदिरा गांधी को समझाया था कि बिना कैबिनेट की सिफारिश के भी आपातकाल का फैसला लिया जा सकता है। इस तरह इंदिरा गांधी छल-कपट का सहारा लेकर निजी हैसियत से राष्ट्रपति के पास पहुंचीं और 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा।
50 years of emergency: जेलों के अंदर भी सुलग रहा था आंदोलनः
इमरजेंसी के दौरान जिसने भी केंद्र सरकार या इंदिरा गांधी के खिलाफ मुंह खोला, सभी जेल में डाल दिये गये। अखबर, फिल्म सबकी बोलती बंद कर दी गई। जेल में जो बूढ़े-बुजुर्ग कैदी थे, वे बेहद डरे हुए थे। लेकिन युवाओं में जोश दिखता था। उनको इसका गर्व था कि वे इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं। जेल में विभिन्न विचारधाराओं के लोग थे। समाजवादी साथियों की एक आदत थी। वे बात-बात में लोहिया का जिक्र कर बैठते थे कि लोहिया जी ने यह कहा है, वह कहा है। जेल के अंदर भी दहशत का माहौल था और जेल के बाहर भी।
50 years of emergency: 5-6 महीने बाद बदलने लगी थी स्थितिः
आपातकाल लगाये जाने के पांच-छह महीने के बाद स्थिति बदलने लगी थी। लोग प्रतिरोध करने लगे थे। जेयप्रकाश नारायण सबको एकजुट करने में जुटे थे। उनमें सब कुछ दांव पर लगाकर लड़ने का माद्दा था। उनकी पहल पर बिहार-यूपी और दिल्ली में आंदोलन तेज होता चला गया। एक तरह इंदिरा सरकार के खिलाफ पूरा जनमानस खड़ा हो गया था। यह देन था जेपी के आंदोलन का। देश के तमाम विपक्षी नेता जेपी के साथ आ गये थे।
50 years of emergency: जबरदस्ती पुरूषों की कराई गई नसंबदीः
संविधान के अनुच्छेद 352 की आड़ लेकर इंदिरा गांधी ने जनसंख्या नियंत्रण का एक ऐसा कठोर कार्यक्रम आरंभ किया जिसने हजारों परिवारों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया। पुरूषों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। उन्होंने झुग्गियों को तोड़ने की एक परियोजना भी चलाई जिसका नतीजा विरोध कर रहे रहवासियों को पुलिस द्वारा मारे जाने के रूप में सामने आया। मानवाधिकारों के हनन की यह कहानी अफसरशाही या निर्वाचित पदाधिकारियों द्वारा नहीं लिखी गई थी, बल्कि यह इंदिरा गांधी के बेटे द्वारा असंवैधानिक शक्ति के प्रयोग से जन्मी थी। प्रेस पर लगे प्रतिबंधों तथा खबरों को गायब किए जाने के कारण देश की आबादी का बड़ा हिस्सा इस बारे में ठीक से जान ही नहीं पाया।
50 years of emergency: खतरनाक थी योजनाः
दरअसल इस इमरजेंसी का एक काला सच यह भी था कि इंदिरा गांधी ऐसी व्यवस्था लागू करने जा रही थीं, जिसके तहत आजीवन उनकी ही सरकार रहती। जब तक इंदिरा जिंदा रहतीं वह पीएम रहतीं। देश पर हमेशा कांग्रेस पार्टी का राज रहता। यहां कोई विपक्ष नहीं होता। मतलब चीन में जो व्यवस्था है, वही यहां भी लागू होती। इसकी पहल की थी इंदिरा गांधी के नजदीकी बीके नेहरू ने और उन्हें साथ मिला था इंदिरा के बेटे संजय गांधी का। इसे योजना के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां भी सीमित किये जाने की योजना थी। परंतु जेपी के आंदोलन ने इस योजना को मूर्त रूप नहीं लेने दिया। बहरहाल आज इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने पर जिन्होंने इसका दंश झेला है, उनके सामने पुरानी कड़वी यादें तैर रही हैं। परंतु यह एक ऐसा काला सच है, जिसे कोई याद करना नहीं चाहता।
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