Sheikh Hasina political impact:
ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश के हालिया चुनावी घटनाक्रम में भले ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी पार्टी आवामी लीग सीधे चुनावी मैदान में नहीं थीं, लेकिन उनके प्रभाव वाले इलाकों में परिणामों ने अलग तस्वीर पेश की। कई जिलों में जनमत संग्रह के दौरान “ना” वोटों की संख्या अधिक रही, जिसे राजनीतिक विश्लेषक हसीना के समर्थन आधार का संकेत मान रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार
रिपोर्टों के अनुसार गोपालगंज, चटगांव, बंदरबन, रंगमती और खगराचारी जैसे जिलों में “ना” के पक्ष में मतदान ज्यादा हुआ। गोपालगंज, जिसे शेख हसीना का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, वहां करीब 2.5 लाख “ना” वोट पड़े, जबकि “हां” के पक्ष में लगभग 1.7 लाख वोट मिले। बंदरबन में “ना” को लगभग 90 हजार और “हां” को करीब 71 हजार वोट मिले। वहीं चटगांव में “ना” के पक्ष में लगभग 1.25 लाख वोट दर्ज किए गए।
अंतरिम सरकार और चुनावी पृष्ठभूमि
2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया था। इस सरकार का मुख्य उद्देश्य चुनाव कराना था। सरकार बनने के बाद आवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसके कारण पार्टी आम चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकी।चुनावी प्रक्रिया को लेकर शेख हसीना ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चुनाव को जनता का वास्तविक समर्थन नहीं मिला, क्योंकि उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई।
‘नो बोट, नो वोट’ अभियान का असर
आवामी लीग समर्थकों ने चुनाव के दौरान “नो बोट, नो वोट” अभियान चलाया। “बोट” पार्टी का चुनाव चिन्ह रहा है। इस अभियान के तहत समर्थकों ने बैलेट पेपर पर यह संदेश लिखकर मतदान बॉक्स में डालने की रणनीति अपनाई। इसका सबसे ज्यादा असर गोपालगंज क्षेत्र में देखने को मिला।बांग्लादेश चुनाव आयोग के अनुसार इस चुनाव में लगभग 60 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। देश में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 12.7 करोड़ बताई गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव में भाग न लेने के बावजूद शेख हसीना का प्रभाव बांग्लादेश की राजनीति में अभी भी मजबूत बना हुआ है।
