Saudi Arabia supports Iran
तेहरान, एजेंसियां। ईरान में बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक संकट के बीच अमेरिका की संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर मिडिल ईस्ट में हलचल तेज हो गई है। इसी बीच खाड़ी के तीन ताकतवर देश सऊदी अरब, कतर और ओमान बैकडोर डिप्लोमेसी के जरिए ईरान के समर्थन में सामने आए हैं। ये देश व्हाइट हाउस को यह समझाने में जुटे हैं कि ईरान पर हमला अमेरिका के हित में नहीं होगा, बल्कि इसका सबसे बड़ा नुकसान खुद वाशिंगटन को उठाना पड़ सकता है।
क्यों अमेरिका को रोकना चाहते हैं ये देश
इन तीनों देशों का मानना है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई से पूरा मिडिल ईस्ट अस्थिर हो सकता है। कतर का कहना है कि जंग की स्थिति में क्षेत्र में अराजकता फैल सकती है और कोई भी देश सुरक्षित नहीं रहेगा। कतर के प्रधानमंत्री ने ईरान की सुरक्षा परिषद के प्रमुख से सीधे संपर्क कर हालात पर चर्चा भी की है।
सऊदी अरब की अलग चिंता
सऊदी अरब ने साफ संकेत दिए हैं कि वह ईरान पर किसी भी अमेरिकी हमले में सहयोग नहीं करेगा, यहां तक कि अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने की अनुमति भी नहीं देगा। सऊदी को डर है कि खामेनेई के बाद अगर सत्ता इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के हाथ में गई तो क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ेगी, जो रियाद के लिए नुकसानदेह होगी।
ओमान का फोकस व्यापार और तेल आपूर्ति पर
ओमान की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज स्ट्रेट है। अगर ईरान पर हमला हुआ तो यह अहम समुद्री मार्ग बंद हो सकता है। होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का करीब 25% तेल और 20% LNG व्यापार गुजरता है। ऐसे में जंग का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और कीमतों पर पड़ेगा।
अमेरिका को समझाए गए 4 बड़े फायदे
इन देशों ने अमेरिका को समझाया है कि जंग न करने से क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहेगी, तेल और गैस सप्लाई बाधित नहीं होगी, अमेरिकी सैन्य ठिकाने सुरक्षित रहेंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
ईरान के लिए राहत की खबर
सऊदी और कतर जैसे अमेरिकी करीबी देशों का यह रुख ईरान के लिए बड़ी कूटनीतिक राहत माना जा रहा है, खासकर तब जब इन देशों में अमेरिका के बड़े सैन्य अड्डे मौजूद हैं।








