सरहुल, पूर्वी भारत के आदिवासियों के मुख्य त्योहारों में से एक है। आम सी बात है कि ये पर्व भी आदिवासी समुदाय के अन्य पर्वों की ही तरह प्रकृति से जुड़ा है।
इस पर्व में पाहन उपवास रखते हैं, साल के फूलों की पूजा करते हैं, पाहन द्वारा मुर्गे की बलि दी जाती है और नाच-गाना करते हुए लोग नए साल का स्वागत करते हैं।
संक्षेप में कहें तो यही है सरहुल। सरहुल के इतिहास की बात करें तो झारखंड, ओडिसा और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इस पर्व को हजारों सालों से मनाते आ रहे है।
महाभारत काल से भी जुड़ता है सरहुल का लिंक
सरहुल से जुड़ी ये कहानी हमें महाभारत काल में ले जाती है। जब भारत कौरवों और पांडवों के बीच बटा हुआ था।
उस युद्ध में आदिवासी कौरवों के खेमे में थे और पांडवों के खिलाफ युद्ध लड़े थे। युद्ध में पांडवों के हाथों कई मुंडा सरदार मारे गए थे।
मान्यता के अनुसार मारे गए आदिवासी सैनिकों से शवों की पहचान के लिए उनके मृत देह को साल के पत्तों और टहनियों से ढक दिया गया था।
महाभारत युद्ध का जब अंत हुआ तो सभी ने देखा कि जिन शवों को साल के पत्तों से ढका गया था वे समय के साथ नहीं सड़े और उनकी अवस्था ठीक थी, लेकिन जो शव अन्य चीजों से ढके हुए थे वे शव सड़ गए थे।
इस चमत्कारी घटना के बाद साल के पेड़, फूल और पत्ते आदिवासियों की आस्था के प्रतीक बन गए और उनकी इसी आस्था ने समय के साथ सरहुल का रुप ले लिया।
धरती और सूरज के प्रेम और त्याग का प्रतीक है सरहुल
सरहुल से जुड़ी ये दूसरी कहनी धरती और सूरज से जुड़ी है। पुरखों के अनुसार धरती और सूरज एक दूसरे से प्रेम करते हैं।
उनकी शादी भी होती है, लेकिन अपने बच्चों (पेड़-पौधे और मानुष) की भलाई के लिए धरती सूरज के पास नहीं जा पाती है।
क्योंकि धरती की कोख से जनमें पेड़-पौधे और मनुष्य सूरज का ताप सहन नहीं कर सकते। मान्यता के अनुसार सूरज धरती के प्रेम में दहकता रहता है और धरती माता तपती है।
नदी-समुद्र, ताल-तालाब से ये देखा नहीं जाता है तो वो बादल बन जाते हैं और धरती को सूरज के ताप से बचा कर ठंडक देते हैं।
सरहुल इसी त्याग और प्रेम को अपनाने का पर्व है। सरहुल में सूरज और धरती की शादी की जाती है।
शादी में पाहन को सूरज और पहनाईन को धरती माना जाता है। हर साल पूजा से पहले सरना स्थल को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
सरहुल में पाहन को सूर्य बाबा और पहनाईन को धरती माता का प्रतीक मानकर इनका विवाह करने के बाद सरना स्थल पर सखुआ वृक्ष के नीचे पूजा की जाती है।
धरती माता की इकलौती पुत्री बिंदी से जुड़ी है कहानी
खोजबीन के दौरान हमें सरहूल से जुड़ी एक और लोककथा मिली। ये कथा धरती माता की इकलौती पुत्री बिंदी से जुड़ी है।
कथा के अनुसार बिंदी एक दिन तालाब से स्नान करके घर नहीं लौटी। बिंदी की खोज में धरती माता ने चारों ओर अपने दूत भेजे, लेकिन वह कहीं नहीं मिली।
इस बात से दुखी होकर धरती माता रोने लगी। उनके रोने से पेड़ों की पत्तियाँ टूट कर जमीन पर गिरने लगीं। हर ओर सन्नाटा था।
काफी समय की खोजबीन के बाद खबर मिली कि बिंदी पाताल में मृत्यु के देवता के पास है।
दूतों ने मृत्यु के देवता को इस बात से अवगत कराया कि बिंदी धरती माता की इकलौती बेटी है और वे चाहती हैं कि बिंदी को उन्हें वापस किया जाए।
लेकिन मृत्यु के देवता ने दूतों को यह कहकर लौटा दिया जो भी एक बार मृत्यु लोक में पहुंच जाता है वे कभी वापस नहीं लौट सकता।
हालाँकि जब दूतों ने तर्क दिया कि अगर बिंदी उसके पास वापस नहीं लौटी तो धरती माता मर जाएंगी और पूरी सृष्टि समाप्त हो जाएगी।
इस बात को सुनकर मृत्यु के देवता दुविधा में पड़ गए। उन्होंने सृष्टि और धरती माता को बचाने के लिए बिंदी को वापस भेजने का समझौता कर लिया।
लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि बिंदी एक साल का आधा समय पृथ्वी पर और आधा समय मृत्यु लोक में बिताएगी।
तब से, जब बिंदी वापस आती है तो धरती माता खुशियों से भर उठती हैं और हर जगह हरियाली फैल जाती है। सरहुल बिंदी की वापसी के लिए मनाया जाता है।
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