झारखण्ड के 10 मशहूर कलाकृतियां

झारखण्ड राज्य के आदिवासी जनजाति दुनिया की पुरानी जनजातियों में से एक है। यह राज्य अपनी चित्रकला और शिल्पकला को अभी भी जीवंत रखे हुए है। आगे की स्लाइड्स में हम जानेंगे ऐसे ही दुनिया से अलग कुछ विशिष्ट 10 चित्रकलाओं और शिल्पकलाओं के बारे में।

सोहराई चित्रकला

ये चित्रकला अपनी मोटी मोटी और गहरे रेखाओं और एकरंगी चित्रों से अपनी एक विशिस्ट पहचान बनाती है। सोहराई झारखण्ड का फसल काटने की ख़ुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। इसीलिए इन चित्रों में ज्यादातर वनों, वन्य जीवों और पर्यावरण की चीजों को दर्शाया जाता है। 

कोहवर चित्रकला

ये चित्रकला अपनी मोटी मोटी और गहरे रेखाओं और एकरंगी चित्रों से अपनी एक विशिस्ट पहचान बनाती है। सोहराई झारखण्ड का फसल काटने की ख़ुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। इसीलिए इन चित्रों में ज्यादातर वनों, वन्य जीवों और पर्यावरण की चीजों को दर्शाया जाता है। 

जादोपाटिया चित्रकला

जादोपटिया चित्रकला में अकसर मनोरंजक चीजें, देवी देवताओं तथा दन्तकथओं को चित्रकला के जरिये दर्शाया जाता है। यह आदिकाल से चले आ रहे विभिन्न माध्यमों एक चित्रकला है। भारत में ऐसे कई सारे क्षेत्रीय कलाएं आज भी जिवंत है जो कि आपको उस दुनिया में ले जाते है जहां आपसी विचारों को साझा करने के लिए कोई आधुनिक सुविधाएँ नहीं होती थी। 

पैठकर चित्रकला

पैठकर कला राज्य की आदिवासी धरोहर में से एक है। ये आकृतियां मानव जीवन से लेकर रीती-रिवाजों और त्योहारों को परिभाषित करती है। इन आकृतियों में महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों को भी दर्शाया गया है।  

कुर्मी चित्रकला

कुर्मी चित्रकला झारखण्ड की क्षेत्रीय जाति कुर्मी समुदाय द्वारा ठण्ड के मौसम में फसल कटने के खुशी में अपने घरों की दीवारों को सजाने के लिए बनती है। इन आकृतियों में धारीदार जानवर, लम्बी गर्दन और सींग वाले देवताओं को दर्शाया जाता है। इन चित्रकलाओं को प्रकृति रूप से मिलने वाली मिट्टी के रंगों से बनाया जाता है। 

आदिवासी आभूषण

आदिवासी आभूषण अपने आप में अलग ही आकर्सन पैदा करते है। इनमे झारखण्ड की क्षेत्रीय कलाओं का विवरण होता है। इनको बनाने के लिए चांदी और बेहद ही आसानी से मिल जाने वाले मोतियों का इस्तेमाल किया जाता है। आप क्षेत्रीय और देहाती महिलाओं को ये आभूषण अपने माथें पर टिकुली के रूप में या फिर कमर में करधनी के रूप में पहने हुए देख पाएंगे। इन आभूषणों की लिस्ट इतनी लम्बी है एक वाक्य में बयां करना मुश्किल है। 

टेराकोटा

मौर्या काल से चली आ रही ये मिट्टी की कलाकृतियां पुरे विश्व में आपको भारत में ही सबसे ज्यादा देखने को मिलेंगी। झारखण्ड की ये कला कुछ विशिस्ट इसलिए है क्यूंकि इन्हे क्षेत्रीय कुम्हार लाल मिट्टी से अलग अलग कलाकृतियां जैसे मिट्टी के जानवर, बर्तन इत्यादि बनाकर आग में पकाते है।

डोकरा शिल्प (Lost Vax Technique)

4000 साल पुरानी झारखण्ड की डोकरा कला धातुओं से बनाया जाता है। इन आकृतियों को बनाना एक बेहद ही जटिल कार्य है। झारखण्ड के पुंडी गांव के मल्होरे इस कला के संरक्षक और अभ्यासकर्ता हैं। डोकरा शिल्पों को मिट्टी के सांचों को गर्म तारकोल में ढककर तथा उनमे प्रकृति से जुड़ी हुई आकृतियां उकेरी जाती है। फिर इन साँचो में धातु भरकर आग में पकाया जाता है।

कागज की कलाकृतियां (Paper Mache)

पेपर-मैशे एक ऐसी कला है जो कागज़ के गूदे को गोंद के साथ मिलाकर बनाई जाती है। पारंपरिक पेपर-मैशे बनाने की कला में निपुण कारीगर दुर्गा पूजा जैसे सांस्कृतिक उत्सवों और नाट्य प्रदर्शनों के दौरान नृत्य और अभिनय करने वाले सेराइकेला छऊ कलाकारों के लिए पौराणिक कथाओं पर आधारित ये मुखौटे बनाते हैं।

लकड़ी की शिल्पकला 

हरे-भरे पेड़-पौधों से भरपूर झारखंड राज्य लकड़ी के शिल्पों में भी समृद्ध है। लकड़ी से बनें रोजमर्रा की जरूरत के सामान, घर में इस्तेमाल होने वाले फर्नीचर  के सामान जैसे कुर्सियां, मेज़, बक्से इत्यादि लकड़ियों से बनाये जाते है और इनमे झारखण्ड की क्षेत्रीय कलाकृतियों को बड़े सफाई के साथ उकेरा जाता है। 

बांस और बेंत की शिल्पकला

झारखण्ड के बांस पतले होने के साथ बेहद ही मजबूत होते है। इनसे बनी हुई कुर्सियां, टोकरी, शिल्पकलाएँ तथा अन्य रोजमर्रा की जरूरत के सामान। खास बात ये है की ये बांस से बनें शिल्पकलाएँ बेहद ही मजबूत और टिकाऊ होते हैं। 

कुचाई या तुसार रेशम

भारत में तुसार रेशम के उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा झारखंड का है। यह रेशम, विशेष रूप से साड़ी बनाने में उपयोग किया जाता है, चौड़े पंखों वाले पतंगों के लाखों जैविक रेशम के कोकून की कटाई से तैयार किया जाता है।