झारखंड का सरहुल पर्व आदिवासी समाज की विविध परंपराओं और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जिसे अलग-अलग समुदाय अपने खास तरीके से मनाते हैं। मुंडा समुदाय इसे ‘बाहा पोरोब’ के रूप में सखुआ पेड़ के नीचे पूजा के साथ मनाता है, जबकि हो समुदाय ‘बा पोरोब’ के तहत तीन दिनों तक फूलों के त्योहार के रूप में उत्सव करता है। उरांव समाज में ‘खेखेल बेंजा’ के रूप में सूर्य और धरती के प्रतीकात्मक विवाह की परंपरा निभाई जाती है। वहीं संथाल समुदाय ‘बाहा पर्व’ में साल और महुआ पेड़ों की पूजा के साथ पारंपरिक नृत्य करता है। खड़िया समाज इसे ‘जांकोर’ पर्व के रूप में मनाते हुए प्रकृति और खेती से जुड़ी परंपराओं को निभाता है। इन सभी परंपराओं में एक समानता यह है कि सरहुल प्रकृति के प्रति आस्था, सामूहिकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का संदेश देता है।
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