झारखंड के प्रमुख आदिवासी पर्व सरहुल में सखुआ (साल) पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है, जिसके पीछे धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। लोककथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के दौरान मुंडा जनजाति के योद्धाओं ने कौरव पक्ष से युद्ध किया था। युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए योद्धाओं के शवों को सखुआ के पत्तों और शाखाओं से ढक दिया गया था। माना जाता है कि जिन शवों को सखुआ पत्तों से ढका गया, वे लंबे समय तक सुरक्षित रहे, जबकि अन्य पत्तों से ढके शव जल्दी नष्ट हो गए। इस घटना के बाद आदिवासी समाज में सखुआ पेड़ के प्रति गहरी आस्था विकसित हुई। आज यही आस्था सरहुल पर्व के रूप में जीवित है, जिसमें प्रकृति, नए जीवन और सामूहिक संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान सिंगबोंगा की पूजा, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से आदिवासी पहचान को सशक्त किया जाता है।
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