झारखंड समेत पूर्वी भारत के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व प्रकृति, संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम है। ‘सरहुल’ शब्द ‘सर’ यानी सखुआ (साल) फूल और ‘हूल’ यानी परिवर्तन से मिलकर बना है, जो प्रकृति में नए जीवन और बदलाव का प्रतीक है। इस पर्व में गांव के धर्मगुरु ‘पाहन’ सरना स्थल पर सृष्टिकर्ता देवता सिंगबोंगा की पूजा कर गांव की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। पूजा के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए जाते हैं, जिनमें जल रखाई, खिचड़ी अनुष्ठान और वर्षा का पूर्वानुमान शामिल है। सरहुल में लोकनृत्य, गीत-संगीत और पारंपरिक वेशभूषा की झलक देखने को मिलती है, जो आदिवासी पहचान को मजबूत बनाती है। यह पर्व झारखंड के साथ ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में भी धूमधाम से मनाया जाता है और समाज को प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।
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