झारखंड में होलिका दहन नहीं करते, फगुआ काटते हैं आदिवासी

IDTV Indradhanush
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सेमल का पेड़ जलाने का है रिवाज

रांची: झारखंड के आदिवासी समुदायों में भी होली को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। साथ ही होलिका दहन को लेकर भी तैयारियां शुरू हो गयी हैं। पर क्या आप जानते हैं कि आदिवासी समुदाय के लोग होलिका दहन नहीं करते, बल्कि फगुआ काटते हैं।

फिर इसके अगले दिन शिकार पर निकलते हैं।  खास तौर पर झारखंड का उरांव जानजातीय समाज इस परंपरा का निर्वहन सदियों से करता आ रहा है। झारखंड के प्रसिद्ध मानवशास्त्री डॉ करमा उरांव बताते हैं कि सरकार के वन्य जीवों के संरक्षण  की कोशिशों के बाद अब परंपरा में बदलाव हुआ है।

अब फगुआ काटने के बाद वन्य जीवों के संरक्षण का संकल्प लिया जाता है। डॅा उरांव बताते हैं कि उरांव जनजाति में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बताते चलें कि अलग-अलग आदिवासी समुदाय में होली और होलिका दहन की अलग-अलग परंपरा है।

मुर्गे की बलि की भी है प्रथा

फाल्गुन पूर्णिमा की रात शुभ मुहूर्त में गांव के पाहन द्वारा सेमल या एरंड की डालियों पर घास-पुआल लपेट कर उसे जलाया जाता है। जलती हुई डालियों को गांव के लोग तलवार या दूसरे धारदार हथियारों से काटते है।

पूजा के दौरान मुर्गे की बलि दी जाती है। फाग जलने से उठने वाले धुएं की दिशा देखकर पाहन और बड़े-बुजुर्ग ये बता देते हैं कि इस साल मॉनसून में बारिश कैसी होगी। आदिवासी समाज में फगुआ काटने के बाद सामूहिक नाच-गान भी होता है।

अलग-अलग समुदाय में भिन्न-भिन्न परंपरा

झारखंड के अलग-अलग आदिवासी समुदाय में भिन्न-भिन्न प्रकार से होलिका दहन मनाने की परंपरा है। पूरे देश में होलिका दहन को लेकर भक्त प्रह्लाद, राजा हिरण्ययकश्यप और उसकी बहन होलिका से जुड़ी कहानी प्रचलित है। परंतु जनजातीय समाज की मान्यताएं अलग-अलग हैं।

उनके बीच कई अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। एक प्रमुख कहानी है कि प्राचीन काल में जब जनजातीय समाज शिकार पर आश्रित था। उस वक्त शिकार के दौरान रास्ते में एक बड़ा सांप मिला। जिसे सांसूडी कहते हैं। सांसूडी अपने सांस से ही जानवरों और लोगों को खींचकर अपना निवाला बनाता था।

  फिर एक महिला के सुझाव पर धधकती आग लेकर वे निकले। जैसे ही महिला आग को माथे पर लेकर से रास्ते से गुजरने लगी, तो उस सांप ने उसे अपनी ओर खींच लिया। उसके बाद आग और राख से सांप अंधा हो गया। फिर लोगों ने उसे मार दिया। सांप सेमल के पेड़ पर रहता था।

आदिवासियों ने उस पेड़ में सूखे खैर बांधकर आग लगा दी, ताकि कोई दूसरा सांप अगर हो, तो वह भी मर जाये।। इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा के दिन आदिवासियों में सेमल की डाली पर खैर बांधकर जलाने की परंपरा है। इसलिए फाग के दिन आदिवासियों में सेमल की डाली पर खैर बांधकर जलाने की परंपरा है। कुछ समुदायों में जलती आग में सांप की आहूति भी दी जाती है।

भगवान शंकर से भी जुड़ी है कहानी

एक अन्य कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में सारू पहाड़ पर एक सेमल का पेड़ था। उस पेड़ पर दो राक्षस रूपी गिद्ध सोनो और रूपो रहते थे। दोनों मनुष्य के छोटे-छोटे बच्चों को अपना आहार बना लेते थे। इससे परेशान होकर लोगों ने भगवान शंकर से विनती की।

महादेव ने इन गिद्धों को मारने के लिए लोहार से 12 मन का धनुष और नौ मन का तीर बनाने के लिए कहा। ठीक फागू चंदो अर्थात फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एक मचान बनाकर भगवान महादेव वहां बैठ गये और पूर्णिमा की चांद की रोशनी से देखकर पेड़ पर बैठे दोनों गिद्धों को मार गिराया।

उस सेमल के पेड़ पर और कोई राक्षस ना रह सके, इसके लिए गांव वालों ने सेमल के पेड़ को आग लगाकर जला दिया। राक्षसों के मारे जाने की खुशी में गांव वालों ने दूसरे दिन जमकर उत्सव मनाया। उसके बाद से ही फाल्गुन पूर्णिमा दिन सेमल के पेड़ को जलाने और दूसरे दिन उत्सव मनाने की परंपरा की नींव पड़ी। यह आज भी जारी है।

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