रांची। नौकरशाही वह कड़ी है, जिसके जरिए कोई भी सरकार जनता तक पहुंचती है। नौकरशाह ही हैं, जो सरकार की योजनाओं, उसके वादों, उसके इरादों को सरजमीं पर उतारते हैं, लेकिन नौकरशाह कोड ऑफ कंडक्ट से बंधे होते हैं। उन्हें तयशुदा नियम-कायदा-कानून के दायरे में रहकर यह काम करना पड़ता है।
वह सरकार में बैठे नेताओं की हुक्म तो बजाते हैं, लेकिन वह हर हाल में सरकार के यस मैन की भूमिका में नहीं रह सकते। सरकार के किसी आदेश-निर्देश से अगर नियमों का अतिक्रमण हो रहा है, तो नौकरशाह के पास आपत्ति जताने के पर्याप्त अधिकार भी हैं।
इस वजह से कई बार नौकरशाहों को सत्तारूढ़ नेताओं का कोपभाजन बनना पड़ता है। उन्हें शंटिंग पोस्ट पर जाना पड़ता है। आप सोचेंगे कि ब्यूरोक्रेसी को लेकर हम ये फिलास्फिकल बातें क्यों कर रहे हैं। दरअसल झारखंड में अचानक मुख्य सचिव बदल दिए गए हैं।
सुखदेव सिंह आगामी मार्च में रिटायर होने वाले थे, लेकिन इसके तीन महीने पहले वह इस पद से हटा दिए गए। राज्य में शीर्ष स्तर पर ब्यूरोक्रेसी में हुए इस अहम बदलाव की परिघटना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सरकार और नौकरशाही के संबंधों की पृष्ठभूमि किन-किन फैक्टर्स से प्रभावित होती है।
सुखदेव सिंह 1 अप्रैल 2020 को राज्य के मुख्य सचिव बनाए गए थे। 1987 बैच के इस आइएएस की पहचान नियमों के पाबंद काबिल अफसर के तौर पर रही है। हेमंत सोरेन ने 2019 में दूसरी बार जब झारखंड के मुख्यमंत्री का पद संभाला, तब उन्होंने राज्य के सबसे तेज तर्रार आईएएस माने जाने वाले सुखदेव सिंह को मुख्य सचिव बना कर यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह राज्य को आगे ले जाना चाहते हैं।
सुखदेव सिंह को मुख्य सचिव बनाने के पीछे उनका झारखंड में काफी लंबा प्रशासनिक अनुभव कारण रहा था। वह पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रधान सचिव की भूमिका भी निभा चुके थे। विकास आयुक्त, वित्त आयुक्त, वन एवं पर्यावरण और कैबिनेट समेत सभी कोर डिमार्टमेंट का कार्यभार संभाल चुके थे। अब रिटायर होने के करीब तीन महीने पहले उनके तबादले के फैसले से सभी हैरान है।
सुखदेव सिंह ने भी सरकार के भरोसे पर खरा उतरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। चार साल के दौरान शांतिपूर्वक बड़ी ही कुशलता से सरकार की विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाते रहे। वह मार्च 2024 में सेवानिवृत्त होंगे और कहा जाता है कि उन्हें राज्य के सीएस के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने का संकेत दिया गया था। फिर अचानक 6 दिसंबर को उन्हें अचानक इस दायित्व से मुक्त करते हुए एटीआइ यानी एडिमिनिस्ट्रेटिव ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में महानिदेशक के तौर पर तैनात कर दिया गया।
यह ब्यूरोक्रेसी में शंटिंग पोस्ट माना जाता है, क्योंकि एटीआई के महानिदेशक की राज्य के शासन-प्रशासन में सीधे तौर पर कोई सक्रिय भूमिका नहीं होती। नौकरशाही के शीर्ष पर अचानक हुए बदलाव ने सबको हैरान कर दिया है, क्योंकि सुखदेव सिंह को मुख्यमंत्री का करीबी माना जाता था। 2013 में जब हेमंत सोरेन पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने सुखदेव सिंह को अपना प्रधान सचिव चुना था। उन्होंने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों शिबू सोरेन और मधु कोड़ा के प्रधान सचिव के रूप में भी काम किया था।
सुखदेव सिंह की जगह लाये गये एल खियांग्ते भी अक्टूबर 2024 में ही रिटायर हो रहे हैं। यानि झारखंड में होनेवाले अगले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आगामी जनवरी से अक्टूबर के बीच के कालखंड को लेकर राज्य सरकार के मन में क्या चल रहा है।
खियांग्ते 31 अक्टूबर, 2024 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और तब तक उनके अपने नए कार्यभार पर बने रहने की संभावना है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अगले साल नवंबर-दिसंबर में समाप्त होगा। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता अक्टूबर या नवंबर 2024 में लागू हो सकती है। इसलिए यह संभावना नहीं है कि झारखंड में तब तक मुख्य सचिव के रूप में किसी और अफसर की तैनाती हो।
जानकारों का कहना है कि चुनावी साल के दौरान राज्य सरकार चुनावी मोड में आ जाती है और अपने खास चुनावी एजेंडों पर फोकस करती है। वह अपने एजेंडों के अनुरूप ही योजनाएं बनाती है, ताकि चुनाव में इन्हें भुना सके। कई बार चुनावी एजेंडों को लेकर बनाई जाने वाली लोकलुभावन योजनाएं थोड़ी अव्यावहारिक या अतार्किक भी होती हैं।
मुमकिन है कि ब्यूरोक्रेसी में शीर्ष पर बैठा अफसर अगर नियमों के प्रति पाबंद हो तो सरकार की लोकलुभावन योजनाओं को जमीन पर लाने की राह में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। लिहाजा, संभव है कि सुखदेव सिंह को चीफ सेक्रेट्री पद से हटाए जाने के पीछे ऐसी ही कोई परिस्थिति पैदा हुई हो। उन्होंने इस पद पर रहते हुए फाइलों की नोटिंग में सरकार की कुछ योजनाओं की व्यावहारिकता पर सवाल खड़े किए थे।
झारखंड की मौजूदा सरकार अगले साल फरवरी-मार्च में अपने मौजूदा कार्यकाल का अंतिम बजट भी पेश करेगी। जाहिर है यह चुनावी और लोक लुभावन बजट होगा।
ऐसे में शीर्ष पदों पर मौजूद अफसरों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि किसी भी ऐसी योजना में ब्यूरोक्रेसी शीर्ष अफसरों की सहमति तो जरूरी होती ही है, साथ ही, योजना को घरातल पर उतारने में भी उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। खास तौर वित्तीय मामलों में तो अफसरों की भूमिका खास हो जाती है। कहा जाता है कि पूरा वित्त विभाग उस दौरान मुख्य सचिव के नियंत्रण में रह कर ही योजनाएं बनाता और उन्हें अंतिम रूप देता है। यही योजनाएं आगे चल कर सरकार को माइलेज देती हैं। मध्य प्रदेश इसका ताजा उदाहरण है, जहां चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लाड़ली योजना लेकर आये। न सिर्फ लेकर आये, बल्कि इस योजना को इतने शानदार ढंग से अमली जामा पहनाया कि विरोधी चारों खाने चित हो गये ।
हेमंत सोरेन सरकार भी इससे नावाकिफ नहीं है। सरकार ऐसे में हमेशा सेफ गेम खेलना चाहती है और कभी नहीं चाहेगी कि शीर्ष के महत्वपूर्ण पदों पर कोई ऐसा अधिकारी बैठा रहे, जो अपने सिद्धांतों के कारण किसी प्लानिंग या योजना से असहमति जताये, क्योंकि इससे सरकार की किरकिरी हो सकती है। इतना ही नहीं, बैठे बिठाये विपक्ष को इससे मुद्दा भी मिल सकता है। वैसे भी सुखदेव सिंह अपने सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं। बदलाव की एक वजह तो यह भी हो सकती है।
कहा जाता है कि समय-समय पर सुखदेव सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान सरकार के कई ऐसे निर्णयों पर अपनी उंगली रखी, जिससे सत्ता को तकलीफ तो हुई होगी। करीब सवा साल पहले जब हेमंत सोरेन सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का निर्णय लिया था, तब बताया जाता है कि सुखदेव सिंह इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने वित्तीय भार आदि का हवाला देते हुए इसे प्रासंगिक नहीं बताया था। पर मुख्यमंत्री चाहते थे कि पुरानी पेंशन योजना लागू हो, तो चाहे न चाहे मुख्य सचिव करते भी क्या। इससे पहले 2022 में ही पिछले 16 साल के दौरान हुई वित्तीय अनियमतताओं के मामले को सुखदेव सिंह ने कब्र से खोद निकाला।
करीब एक लाख तीन करोड़ रुपये की राशि के खर्च का हिसाब-किताब नहीं मिल रहा था। ये राशि बीते 16 वर्षों के दौरान सरकार ने अपने विभिन्न विभागों को दी थीं। विभागों ने सरकार से मिली रकम खर्च भी कर दी, लेकिन इसका पूरा ब्योरा यानी उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा ही नहीं किया गया। इतना ही नहीं, विभागों के अफसर इस बाबत सरकार की ओर से बार-बार भेजे गये रिमाइंडर को नजरअंदाज करते रहे। तब मुख्य सचिव सुखदेव सिंह ने इसे लेकर सभी विभागों के सचिवों पर नकेल कसी।
ऑडिटर जनरल के पत्र को आधार बनाकर उन्होंने विभागों पर दबाव बनाया। कहा जाता है कि तब कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री तक दौड़ लगायी थी। सुखदेव सिंह ईमानदार अधिकारी माने जाते हैं। सरकार भी यह भली भांति जानती है। ऐसे में कहीं न कहीं न चाहते हुए भी वह सरकार की किरकिरी का कारण बन सकते थे। बहरहाल सुखदेव सिंह अब एटीआइ के महानिदेशक बन चुके हैं। सरकार अपना सेफ गेम खेल चुकी है। अब चुनावी वर्ष में और क्या-क्या चालें चली जाएंगी, ये देखना दिलचस्प होगा।








