Jharkhand High Court
रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में लिया है कि किसी पत्नी को अपनी नौकरी छोड़कर पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि पत्नी का नौकरी जारी रखना पति से अलग रहने का एक उचित और वैध कारण हो सकता है। दांपत्य अधिकारों की बहाली का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी को जबरन पति की शर्तों पर जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाए। यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने सुनाया।
महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता को दिया संवैधानिक महत्व
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आधुनिक समाज में महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने का पूरा अधिकार है। पत्नी का नौकरी करना या उसे जारी रखना किसी भी तरह से अनुचित आचरण नहीं माना जा सकता। विवाह एक साझेदारी है, जिसमें दोनों पक्षों को आपसी सम्मान, समझ और संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि दांपत्य अधिकारों की बहाली के नाम पर पत्नी को अपनी नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या था पूरा मामला
मामले में पति जितेंद्र आजाद ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत अपनी पत्नी के खिलाफ दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी। दोनों का विवाह 12 मार्च 2018 को हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी बिना किसी उचित कारण के उसे छोड़कर अलग रह रही है।
वहीं पत्नी ने अदालत को बताया कि उस पर सरकारी नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था। वह वर्तमान में पाकुड़ जिले के एक सरकारी प्लस टू स्कूल में सहायक शिक्षिका के पद पर कार्यरत है और अपनी नौकरी जारी रखना चाहती है।
फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया
झारखंड हाईकोर्ट ने पाकुड़ फैमिली कोर्ट के 16 जून 2023 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि वह यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी बिना किसी वैध कारण के अलग रह रही है। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूती देने वाला माना जा रहा है।












